विवेक रंजन श्रीवास्तव १. मंगलाचरण जग के नाथ जगन्नाथ, भक्तों के आधार। रथयात्रा का पर्व यह, मंगलमय त्योहार॥ २. कठोपनिषद्…
घर की लक्ष्मी बनकर आई थी स्मिता, अब मेरे बच्चे की दुनिया बन गई है। सुरेन्द्र की हमसफ़र बनकर आयी थी, आज मेरे बच्चे…
घर की लक्ष्मी बनकर आई थी स्मिता, अब मेरे बच्चे की दुनिया बन गई है। सुरेन्द्र की हमसफ़र बनकर आयी थी, आज मेरे बच्चे…
नील गगन में आता सूरज, चंदा से बतियाता सूरज। चमके पूरा दिन शिद्दत से, थक के फ़िर सो जाता सूरज। सर्दी में दिखता है कम ही,…
तुमने बंजर ज़मीन में खूबसूरत सा फुलवारी बना दिया है, क्या ही किया ? तुमने मकानों को घर बना दिया, क्या ही किया ? तुमने…
बैठ पिता के कांधों पर इठलाने को मन करता है। मेले के खेल खिलौनों को घर लाने को मन करता है। पिता अगर फिर से मिल जाएं उन्ह…
पिछले कई दिनों से वही गीत है जहन में जो तुम थी गुनगुनाती वो संगीत है जहन में जिसे सुनकर आज भी मैं हूँ ज़िन्दगी से …
चीनी से भी ज्यादा गुड़ को, मंहगा होते देखा है। घड़ियाली आंसू वाले, एक ठग को रोते देखा है।। बेहद हल्के गहने भी अब, नहीं ग…
हसरतें है मेरी भी कुछ मैं भी एक जान हूं जिम्मेदारी के बोझ तले दबा हुआ मैं भी एक इंसान हूं भूल गया हूं अपनी ख्वाहिशे…
हिन्दुत्व में है जान बता क्यों नहीं देते, इससे भला है सबका जता क्यों नहीं देते। लोहा हैं मानते सभी हिन्दुत्व का जग में…
जल ही जीवन है जीवों का, बूंद बूंद हर मोती है। हर एक पौधा कल्पवृक्ष, हर फल संजीवनि बूटी है।। पर्यावरण सुरक्षित कर लो ,स…
अप्रैल की बारह तारीख को जब यह खबर मिली कि आशा ताई नहीं रहीं तो विश्वास नहीं हुआ। वे सुरों की संभावना ही नहीं, अद्भुत …
*युद्ध नहीं समाधान* धधकती धरती की साँसों में बारूद की गंध है, आकाश भी आज जैसे रोता हुआ निर्जन छंद है। मानवता की आँखों म…
मैं कौन हूँ, क्या नाम मेरा, बस इतना जानो 'मज़दूर' हूँ, सम्मान मिला जो आज मुझे, मैं खुद भी उससे हैरान हूँ। कहते …
खेली जा रही होली रंजिशों की, फेसबुकिया जीवन हैरान हो रहा है....... समझ नहीं आता कर रहा है कौन , कौन परेशान हो रहा है ..…
विश्व एथलेटिक्स दिवस - हर स्कूल में जागरूकता फैलाना है युवा पीढ़ी को खेल में आगे लाना है, स्वस्थ तन के साथ मन का विका…
कविता :-(भारत की नारी ) सुन भारत की नारी तू मत बनना बेचारी। हार मान ना लेना तू तेरी जंग अभी है जारी। फूल नहीं बनना है त…
साहित्य सरोज साप्ताहिक आयोजन क्रम -2 शीर्षक...गुलाब कठिन बेहद जीवन डगर चल पाना नहीं कोई सरल वेदना का पीना पड़े जहर वक्…
आंख खुली अवनि तल पावा, दिव्य ज्योति इक दर्शन पावा। अबोध अज्ञानी बन कर हम, रमते दुनिया कुशल क्षेम पावा।। शनैः शनैः दृग प…
शरद ऋतु जा रहा, ऋतुराज बसंत आ रहा, पतझड़ के इस मौसम में, बसंत ऋतु खिलखिला रहा। सरसों के फूल खिले, चकवा- …
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