बैठ पिता के कांधों पर
इठलाने को मन करता है।
मेले के खेल खिलौनों को
घर लाने को मन करता है।
पिता अगर फिर से मिल जाएं
उन्हें छुपा कर ,रख लूँगी ।
फिर ना छूटे साथ कभी
मैं, नेह पाँस में कस दूँगी ।
घर आते ही डांट पिता की
खाने को मन करता है ।
बैठ पिता के कांधों पर
इठलाने को मन करता है ।।
पिता गए ,अपने सब रूठे
हो गए रिश्ते ,टूटे- टूटे।
जिनको अपना बल माना था
उन लोगों से हाथ ही छूटे।
पकड़ के उंगली साथ आपके
चलने को मन करता है ।
बैठ पिता के कांधों पर
इठलाने को मन करता है।
रूठें तो अब, कैसे रूठें
क्यो कोई मनाने आएगा ।
पिता के जैसे पुचकारे ना
कोई ना ,नाज़ उठाएगा ।
अपनी बातें,बच्चा बनकर
मनवाने को मन करता है ।
बैठ पिता के कांधों पर
इठलाने को मन करता है ।
तीज और त्योहार हमेशा
पिता की याद दिलाते हैं।
जब घर के सारे बच्चो को
कपड़े दिलवाए जाते हैं ।।
हमको कपड़े अपनी जिद से
फिर लाने को मन करता है ।
बैठ पिता के कांधों पर
इठलाने को मन करता है।
पिता के आशीषों से हमने
इज्जत दौलत सब पाया है।
लेकिन सुख का जीवन उतना
पिता का ,जब तक साया है ।
वही पुराने ,नीम के नीचे
घर जाने को मन करता है।
बैठ पिता के कांधों पर
इठलाने को मन करता है ।
किस किस ने क्या क्या ना बोला
लेकिन कुछ ना कह पाएं।
क्या क्या ठेस लगी सीने में
बातें वो किनको बतलाएं।
पिता को,वो सारी पीड़ाएँ
बतलाने को मन करता है।
बैठ पिता के कांधों पर
इठलाने को मन करता है।
जो, आया सो, जाता है
लोगों ने मुझको समझाया।
लेकिन ये , मुझसे पूछो
क्या खोया,क्या ना पाया।
दिल की सारी पीर कलम से
लिख जाने को मन करता है।
बैठ पिता के कांधों पर
इठलाने को मन करता है ।।
डॉ. राधा शर्मा....
सहायक प्राध्यापक (हिन्दी)
भाषा एवं साहित्य विभाग
डॉ. सी. व्ही. रमन विश्वविद्यालय करगी रोड,
कोटा, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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