शीर्षक - 1- संगम तीरे तर्पण या / 2- फरेब / 3-
कहानी
'संगमा' मृत्यु के दरवाजे पर दस्तक देती हुई, सिसकती, बेबस सी ! पति 'अनुभव' के दोनों हाथों में सिर रखे हुए थी। उसकी आँखे बंद जाने कब हो जाएंगी । दोनों पति-पत्नी को भी न पता था कि कितने पल का साथ अब बाकी रह गया है।
संगमा की आँखों में एक भी आँसू नहीं थे क्योंकि यथार्थ के धरातल पर वह 45 वर्षों में बहुत रो चुकी । अब अपने जीवन की अंतिम बेला में वह हँसते व मुस्कुराते हुए श्री हरि चरणों में विश्राम करने जा रही थी।
आज उसके पति की आँखों में 'आँसुओं का झरना ' बह रहा था। संगमा के सूखे व पत्थर बन चुके 'पाषाण हृदय' को उन आँसुओं के झरने की धारा भिगोए जा रही थी। परंतु अब वक्त 'अनुभव' के हाथों से 'मुट्ठी की रेत' की तरह फिसल चुका था।
समय बहुत ही कम था। संगमा ने अनुभव से बस इतना ही कहा " मेरी अंतिम इच्छा है जो बचपन से ही मैं सोचती थी कि मेरी 'चिता की राख' संगम में प्रवाहित हो और बनारस तथा काशी अयोध्या व हरिद्वार के घाटों तक के जल से तृप्ति हो।
कला की देवी संगमा एक कुशल व सुविख्यात अंतरराष्ट्रीय स्तर की पहली भारतीय महिला मूर्तिकार थी । उसकी मूर्तियां देश - विदेश के आलीशान महलों व अत्याधुनिक प्रशासनिक भवनों व बंगलों की शोभा बन चुकी थीं। किंतु जिन मूर्तियों में वह जान फूंक दिया करती थी । वहीं उसे क्या ! पता था कि वह जीते जागते हुए इंसानों से इस कदर हार बैठेगी ।
संगमा ने प्रत्येक व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान बिखेरी अपनी कला द्वारा । उसकी कला का उपयोग लोगों की श्रृद्धा, व भावनाओं से जुड़ा हुआ था। लाखों करोड़ों लोग उसकी बनाई गई मूर्तियों के आगे श्रृद्धा पूर्वक सिर झुकाते।
लेकिन संगमा के लाखों करोड़ों प्रयासों के बावजूद भी, थोड़ी सी भी श्रृद्धा उसके अपनों के हृदय में न जाग सकी उसके लिए।
अपनों के लिए उसने दिन रात मेहनत की। उनके सुख-दुख में शामिल रही। हमेशा उन लोगों के लिए एक पैर पर खड़ी रही। उसे लगता था कि उसके प्रयासों से एक दिन उसका पति प्यार को समझकर, एक ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ व शानदार व्यक्तित्व का धनी व्यक्ति बनेगा। वह दोनों मिलकर एक नई पहचान और दुनिया बनाएंगे। परन्तु वह शायद कहीं न कहीं गलत साबित हो चुकी थी।
संगमा को यह भली-भांति समझ में आ गया था कि वह अपनों के द्वारा भावनात्मक रूप से बुरी तरह ठगी गई है । उसका प्रयोग केवल 'एक चाभी के खिलौने' की तरह किया गया है। उसके अपनों ने उसे खूब छला है। जिसमें सास , ननद , ननदोई, ज्येष्ठ और जिठानी तथा स्वयं उसका पति भी शामिल रहा है। बल्कि उसका पति 'अनुभव' ही मुख्य भूमिका में था ।
संगमा को मारने की कोशिश ' संगम- तट' पर ही की गई थी। उसके पति ने पता नहीं, क्या ? सोंचकर अचानक ही उसे तेजी और तत्परता दिखाते हुए, नाव करके उसे बचा लिया था।
'संगमा' स्वयं भी अब शायद जीना नहीं चाहती थी । उसकी सांसें तेज़ हो गई थीं। परन्तु अचानक एक प्यारी सी आवाज़, संगमा के कानों में गूंजती हुई पड़ी ।
"उठो माँ ! "
उसने आँखे खोली और अपने आप को अस्पताल के बिस्तर पर लेटा हुआ पाया। पास ही में उसका दत्तक पुत्र रंजन खड़ा था।
पुत्र उसकी सेवा - सत्कार में लगा हुआ था। रंजन को संगमा ने अनाथालय से गोद लिया था।वह एक हास्टल में रह कर अपनी पढ़ाई पूरी करके आज ही लौटा था। उसने सपने में भी नहीं सोंचा था कि ऐसे अपनी माँ से अस्पताल के बिस्तर पर मुलाकात करनी पड़ेगी।
रंजन ने अपनी माँ संगमा को अपनी नौकरी लगने के बारे में खुशखबरी सुनाई। दोनों माँ बेटे अपनों से ठगे गए थे पर अनजान रिश्तों की अहमियत को उन दोनों ने आज अच्छे से परख लिया था। दोनों माँ - बेटे की जोड़ी एक मिसाल बन चुकी थी समाज के लिए। अपने हुए पराए पर पराए ही आज अपने बनकर साथ भी निभाएंगे।
समाप्त
सुनीति केशरवानी 'नीति'
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