एक छोटे से गांव में सिया नाम की लड़की रहती थी। उसका घर मिट्टी का बना था। दीवारों पर समय की गहरी दरारें थीं और छत बारिश में अक्सर टपकती रहती थी, मगर उस घर में एक चीज कभी कम नहीं हुई—मोहब्बत। सिया के पिता खेतों में मजदूरी करते थे और मां घर-घर जाकर सिलाई का काम करती थी। गरीबी उनके जीवन की सच्चाई थी, मगर इज्जत और संस्कार उनकी सबसे बड़ी पूंजी थे।सिया बचपन से ही कुछ अलग थी। जब बाकी बच्चे खेल-कूद में लगे रहते, वह पेड़ के नीचे बैठकर किताबों से बातें करती। उसे लगता था कि किताबें इंसान को उन ऊंचाइयों तक ले जा सकती हैं, जहां तक उसके कदम भी नहीं पहुंच सकते। उसके सपने बहुत बड़े थे, मगर उन सपनों तक पहुंचने का रास्ता संघर्षों से भरा हुआ था।
एक दिन स्कूल से लौटते समय उसने अपनी मां को सड़क किनारे बैठा देखा। उनके हाथ में फटा हुआ दुपट्टा था और आंखों में बेबसी साफ दिखाई दे रही थी। सिया का दिल कांप उठा। उसने धीरे से पूछा, "क्या हुआ मां?" मां ने जल्दी से आंसू पोंछे और मुस्कुराकर बोलीं, "कुछ नहीं बेटी, बस धूल आंखों में चली गई।" मगर सिया समझ गई—यह धूल नहीं, हालात की मार थी। उस रात उसने आसमान की ओर देखते हुए मन ही मन कहा, "हे भगवान, मुझे इतना मजबूत बना देना कि मैं अपने घर की तकदीर बदल सकूं।"
अगले ही दिन से उसकी जिंदगी बदल गई। सुबह चार बजे उठना, घर के सारे काम निपटाना, स्कूल जाना, लौटकर छोटे बच्चों को पढ़ाना और फिर रात को अपनी पढ़ाई—यह उसकी दिनचर्या बन गई। शरीर थक जाता था, मगर सपनों की आग उसे रुकने नहीं देती थी।एक दिन उसकी सहेली ने हैरानी से पूछा, "तू इतनी मेहनत क्यों करती है?" सिया ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, "क्योंकि मैं अपने माता-पिता के माथे की चिंता की हर एक लकीर मिटाना चाहती हूं।"
समय धीरे-धीरे बीतता गया। संघर्ष अब उसकी आदत बन चुका था। कई बार उसे भूखे पेट ही पढ़ना पड़ा, कई बार अपनी छोटी-छोटी खुशियों का त्याग करना पड़ा। कई रातें ऐसी भी थीं जब घर में बिजली नहीं होती थी, और वह दीये की मद्धम रोशनी में घंटों पढ़ती रहती थी। उसकी आंखें थक जाती थीं, मगर उसका हौसला कभी नहीं थकता था। आखिरकार बोर्ड परीक्षा का समय आ गया। पूरे गांव की नजरें अब सिया पर टिक गई थीं। लोगों को उससे उम्मीद थी, मगर सिया को खुद पर भरोसा था—उसे यकीन था कि सच्ची मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती। परिणाम घोषित हुआ—सिया पूरे जिले में प्रथम स्थान पर आई।
उस दिन उसका छोटा-सा घर खुशियों से भर गया। लोगों का तांता लग गया, मिठाइयां बंटने लगीं, बधाइयों की आवाजें गूंजने लगीं। मगर सिया के लिए सबसे खास पल वह था, जब उसने अपने पिता की आंखों में गर्व के आंसू देखे। वे कुछ नहीं बोले, मगर उनकी आंखें सब कुछ कह रही थीं—“आज मेरी मेहनत सफल हो गई।” आगे की पढ़ाई के लिए सिया को शहर जाना पड़ा। नया माहौल, नए लोग, और बिल्कुल अलग जिंदगी—सब कुछ उसके लिए अनजान था। वहां लोग उसके साधारण कपड़ों और गांव की बोली का मजाक उड़ाते थे। कई बार उसे लगा कि वह इस जगह के लिए नहीं बनी है।
शहर की भीड़ में वह खुद को अकेला महसूस करने लगी। कई रातें ऐसी थीं जब वह छत पर बैठकर अपने गांव को याद करती और चुपचाप रो लेती। मगर हर बार उसे अपनी मां के हाथों की सिलाई और पिता के पसीने की वह सोंधी खुशबू याद आती, जो उसे फिर से खड़े होने की ताकत देती थी।उसने हार मानना कभी नहीं सीखा था। सालों की लगातार मेहनत, संघर्ष और अटूट विश्वास के बाद आखिरकार उसने एक बड़ी प्रतियोगी परीक्षा पास की और एक अधिकारी बन गई। जिस घर में कभी दीपक जलाने के लिए भी तेल नहीं होता था, आज वही लड़की हजारों घरों में उम्मीद की रोशनी जगा रही थी।लेकिन उसकी कहानी की असली खूबसूरती यहां खत्म नहीं होती।
सिया अपने गांव वापस लौटी। उसने वहां एक पुस्तकालय बनवाया, जहां हर बच्चा बिना किसी फीस के पढ़ सकता था। उसने लड़कियों के लिए छात्रवृत्ति की शुरुआत की, ताकि कोई भी बेटी अपने सपनों को अधूरा न छोड़े। इसके साथ ही उसने गांव में एक छोटा स्वास्थ्य केंद्र भी खुलवाया, जिससे बुजुर्गों को इलाज के लिए दूर न जाना पड़े।धीरे-धीरे गांव की तस्वीर बदलने लगी। जहां कभी अंधेरा और निराशा थी, वहां अब उजाला और उम्मीद दिखाई देने लगी। बच्चों की आंखों में सपने चमकने लगे और लोगों के चेहरों पर मुस्कान लौट आई।
एक दिन उसकी मां ने स्नेह से पूछा, "बेटी, इतनी ऊंचाई पर पहुंचकर भी तू गांव क्यों लौट आई?"सिया ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “क्योंकि पेड़ चाहे कितना भी ऊंचा क्यों न हो जाए, उसकी जड़ें हमेशा मिट्टी में ही रहती हैं। और मैं अपनी मिट्टी को कभी नहीं भूल सकती।” उस रात गांव में हल्की बारिश हुई। भीगी हुई मिट्टी से वही सोंधी खुशबू उठी, जो सिया के बचपन की सबसे प्यारी याद थी। उसने आंखें बंद कीं और उस खुशबू को गहराई से महसूस किया। सच तो यह है— इंसान अपने नाम से बड़ा नहीं होता, बल्कि उन हाथों को थामकर बड़ा होता है जो हर मुश्किल में उसे गिरने नहीं देते। और सिया की कहानी हमें यही सिखाती है—अगर इरादे सच्चे हों और मेहनत दिल से की जाए, तो टूटी छत के नीचे पलने वाले सपने भी एक दिन पूरे आसमान को छू लेते हैं।
श्री ठाकुर
92041 39533
देवघर, झारखंड

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