एक मज़दूर, एक ममता-ज्योति वर्णवाल



मैं कौन हूँ, क्या नाम मेरा, बस इतना जानो 'मज़दूर' हूँ,

सम्मान मिला जो आज मुझे, मैं खुद भी उससे हैरान हूँ।


कहते हैं दुनिया बुरी बहुत, पर भले लोग भी बाकी हैं,

जिनकी नज़रों में हम मज़दूर भी, आखिर एक इंसान हैं।


ग़रीबी ने हाथों में थमा दिया, ये ईंट-गारे का भारी बोझ,

दो वक़्त की रोटी की खातिर, लड़ना पड़ता है खुद से रोज़।


पर यादों के उन गलियारों में, एक मंज़र अक्सर आता है,

जब माँ को ईंटें ढोते देख, ये दिल मेरा भर आता है।


पीठ पे बाँध के छोटी बहन को, कसकर कपड़ा लपेटे हुए,

वो माथे पर तीन-चार ईंटें, हँसते-हँसते ढो लेती थी।


थकान को चेहरे पर न आने देती, वो शक्ति की मूरत थी,

कड़ी धूप में भी वो माँ, सबसे प्यारी सूरत थी।


जब खाने की छुट्टी होती, वो खुद से पहले हमें खिलाती,

दो निवाले हमारे मुँह में डाल, फिर अपना पेट वो भर पाती।


माँ तो माँ होती है साहब, चाहे महलों में हो या मज़दूरी में,

उसका प्यार कभी कम न हुआ, इस मुफ़लिसी और मजबूरी में।


कवयित्री ज्योति वर्णवाल 

नवादा (बिहार)
6299 820 244



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