अस्तित्व-निशाअतुल्य

 लघुकथा

"बाबा माँ कब आएगी मुझे भूख लगी है" कहते हुए श्यामली ठुनकने लगी।

 "आ जायेगी मेरी गुड्डो हो सकता है आज साहब के यहाँ मेहमान आ गए हो तो देर हो गई हो। अच्छा देख तो आज मुझे कितना अच्छा गुड्डा मिला है कबाड़ में । ले अभी तू खेल ले। मैं रोटी बनाता हूँ।" कहते हुए राजेश ने छोटा सा चलित खिलौना आशा को पकड़ा दिया। 

   "पर बाबा मेरा नाम आशा है आप कभी कुछ बोलते हो कभी कुछ" उस स्वचलित खिलौनों को मुस्कुराते हुए देख कर बोली।       

  "बाबा मुझे अच्छा नहीं लगता सारा दिन मैं अकेले आपके व माँ के बिना यहाँ से वहाँ घूमती हूँ। बाबा मैं माँ के साथ हर समय क्यों नहीं रह सकती।" अपनी ही धुन में बोली आशा।

        राजेश जिसने घर का नाम बड़े चाव से आशा का नगर रखा था आज उसके आगे आस्तित्व का संघर्ष लिख------चल दिया।


निशाअतुल्य

निशा गुप्ता जी देहरादून

+91 98378 94997



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