छवि चिन्तन-ममता गिनोड़िया

लघुकथा

मैं हर दिन  तेरा इंतजार करती लेकिन एक दिन पता चला की तुम बहुत बिमार हो।मैं जब तुमसे मिलने गयी ,तब मैनें कहा कम से कम बताना तो चाहिए, मैं तुम को गलत समझती रही और  मुझे लगा कि तुम मुझे भूल गये हो।तुम ने मुझसे कहा कि तुमको परेशान नहीं करना चाहता हूँ।तुम अपने परिवार के साथ  रहती हो ।यदि तुम्हें पता चल जाता तो ,तुम हर दिन मुझ से मिलने आती और मेरी पत्नी नाराज होकर  मुझ से तरह तरह के सवाल करती और तुम्हे तो पता ही हैं,मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता यदि कोई तुम्हारा अपमान  करें।तेरे और मेरे प्यार  को कोई भी नहीं समझता।रुह से रूह के रिश्तों का बदनाम हो जाता ।तुम को जब भी सामने पाता हूँ तब बारबार  दिल दिमाग में यह बात  आती हैं कि तुम  मुझ से पहले क्यों नहीं मिली ,।चारु तुम  बहुत अच्छी हो ,दिल तुम्हारा बड़ा नेक और पवित्र हैं,तुमने आज तक  मुझ से कुछ नहीं मांगा जबकि तुम ही मेरे अभावों की पूर्ति करती रहीं।चारु तुमको जब भी रुपए  पैसों की जरूरत महसूस  हो   मुझ से कहना ,मैं हर खुशी देना चाहता हूँ।चारु का दिल भर आया ,इस बात से की चिन्मय उसे कितना प्यार करता है लेकिन हम दोनों किसी से एक दुसरे के प्यार की चर्चा नहीं कर सकते ।चिन्मय चला गया अपनी चारु को छोड़कर उस दुनिया में जहां से कोई वापस नहीं आता ,आज चारु एकदम अकेली हैं उसकी याद में हर दिन आँसू बहाती हैं।चारु के पास पति ,बच्चें सब है लेकिन नहीं  हैं तो उसका चिन्मय नहीं हैं।

ममता गिनोड़िया
जोराहाट, असम।
94356 10538



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