खेली जा रही होली रंजिशों की,
फेसबुकिया जीवन हैरान हो रहा है.......
समझ नहीं आता कर रहा है कौन ,
कौन परेशान हो रहा है ....
उनकी पोस्ट से ये साब
और,
इनकी पोस्ट से वो साब यूं
मेहरबान हो रहा है.....
हर शय सकते में है आखिर,
महल है किसका ये,
कौन दरबान हो रहा है....
कैसा खेला आरोप-प्रत्यारोप का
खेल रहे हो रचनाकार तुम
तुम्हारा ही
नुकसान हो रहा है......
वो जो कब से कर्जदार था
जमीन का,
स्वयं ही आसमान
हो रहा है..........
किसी का कुछ नहीं बिगडेगा,
मधुर,
शब्दों की इस लड़ाई में
शब्दों का घोर अपमान हो रहा है.....
चाय पर बुला बैठ चर्चा
की जानी चाहिए अब तो
साहित्य का विज्ञान
रो रहा है..........
हमारा नुकसान हो रहा है
साहित्य का नुकसान
हो रहा है........
डॉ मधु खंडेलवाल
अजमेर
संपर्क नंबर 9462131405

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