लोकभाषा लोकजीवन का दस्तावेज़ होती है : डा. रश्मि शील

दिनांक 28 अप्रैल 2026 को कन्नौजी बोली के प्रचार - प्रसार एवं उसके संवर्धन हेतु प्रयासरत 'कन्नौजी बोली समूह' द्वारा मासिक परिचर्चा के रूप में "कन्नौजी की सामयिकता : शैक्षिक संदर्भ" विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता डा. रश्मि शील ने यह बात कही।संगोष्ठी की औपचारिक शुरुआत श्रीमती सुमन पाठक द्वारा सरस्वती वंदना  "कन्नौजी के पटल पर शारदा मईया चली आवऊ" के सुंदर गायन के साथ होती है।संगोष्ठी में अतिथियों एवं श्रोताओं का स्वागत डा. प्रखर दीक्षित के द्वारा होता है उन्होंने विषय की प्रासंगिकता पर बात करते हुए संगोष्ठी में उपस्थित सभी लोगों का स्वागत किया।

संगोष्ठी में बतौर वक्ता उपस्थित दोनों अतिथियों का परिचय विस्तृत रूप से डा. अपूर्वा अवस्थी द्वारा दिया गया। इन्होंने संगोष्ठी में उपस्थित लोगों को "कन्नौजी बोली समूह" द्वारा किए जा रहे प्रयासों से भी अवगत कराया।विषय प्रवर्तन की बात डा. बीरेंद्र कुमार 'चन्द्रसखी' कन्नौजी बोली की सामयिकता पर आधारित एक गीत के साथ करते हुए विषय की सार्थकता को रेखांकित करते है।प्रथम वक्ता के रूप में डॉ. अजय कुमार प्रजापति ने वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में लोकबोलियों की स्थिति और कन्नौजी की सामयिकता पर बात करते है। अपनी बात के दौरान यह कहते है कि कन्नौजी बोली को परीक्षोन्मुख नहीं बल्कि जीवनोन्मुख होना चाहिए तथा विषय की अनिवार्यतः को भी स्पष्ट करते है।

मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. रश्मि शील ने कन्नौजी बोली में व्याप्त विविधताओं को रेखांकित करते हुए अवधी और कन्नौजी के जुड़ाव की बात की और वर्तमान परिदृश्य से गायब होती बोलियों के प्रति चिंता भी जाहिर की। उन्होंने कहा कि हमें अपनी मातृभाषा के लिए चिंता जरूर करनी चाहिए। यह पुनर्लेखन,अनुवाद,संप्रेषणीयता,शोध एवं विचार विमर्श के रास्ते लोक बोलियों को जीवित करने का माध्यम बताती है।संगोष्ठी में बतौर श्रोता उपस्थित अखंड प्रताप सिंह, अशोक धनुषिक,सुमित कुमार,सुनील दत्त आदि ने भी कन्नौजी बोली की स्थिति,उसकी प्रासंगिकता के प्रति चिंता एवं संभावनाएं ज़ाहिर की। संगोष्ठी के समापन के क्रम में सुमित कुमार तथा डा. प्रखर दीक्षित द्वारा लोकगीतों का भी गायन किया गया।

संगोष्ठी की समाप्ति डॉ. महेश मधुकर द्वारा ज्ञापित धन्यवाद ज्ञापन के साथ होती है। इन्होंने एक लोकगीत के साथ संगोष्ठी में उपस्थित सभी लोगों के प्रति धन्यवाद एवं आभार प्रकट किया। इस संगोष्ठी का संचालन पारस सैनी द्वारा किया गया।संगोष्ठी में कन्नौजी बोली क्षेत्र के श्रोताओं सहित बिहार,छत्तीसगढ़,दिल्ली आदि के भी लोग उपस्थित रहे। जिससे कि बोलियों के विविध रंग देखने को मिले।




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