किसानी में-ओम जी मिश्रा

● गीत ●

किसानों को समस्याएँ बहुत आती किसानी में।
न जाने कब बुढापा घेरता उनको जवानी में।।

कभी सूखा करे आहत कभी है बाढ़ का रोना।
समस्याएं स्वयं की जो,उन्हें हरहाल में ढोना।
भरोसे आज भी खेती-किसानी बादलों के है,
प्रकृति ने बेवफाई की गयी फिर भैंस पानी में।
.                        किसानों को समस्याएँ बहुत.......

मिलावट बीज खादों औ दवाओं में बहुत भारी।
रही बढ़ नित्य महँगाई, चलाए जेब पर आरी।
लगा लाइन रहा पर खाद के बिन लौट आया घर,
नहीं उपलब्धता निश्चित, भले हों राजधानी में।
.                        किसानों को समस्याएँ बहुत.......

नहीं अब कीटनाशक, खाद हैं कुछ भी असर करते।
बहुत  से  जानवर  छुट्टा, निडर  हो  खेत  सब चरते।
कहीं  पर  नीलगायों  का  बहुत  आतंक  है  भारी,
बड़ी   है  भूमिका  इनकी किसानों की कहानी में।
.                        किसानों को समस्याएँ बहुत.......

सफलता दूर से देखी, विफलता खूब पाए हैं।,
महाजन के तगादों की मुसीबत के सताए हैं।।
कफ़न के वास्ते भी अब न कोई राह बाकी है,
विवश हैं आत्महत्या को फटी चादर पुरानी में।।
.                        किसानों को समस्याएँ बहुत.......

भले  सरकार  करती  जाप  हो  पक्के  मकानों  का।
न डिजिटल इण्डिया से कुछ भला होता किसानों का।
नहीं सरकार को इन पर दया प्रभु तुम दया कर दो,
व्यवस्था हो सुदृढ़ इनकी रहें सम लाभ-हानी में।
.                        किसानों को समस्याएँ बहुत.......
 ओम जी मिश्र
लखनऊ 

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