जन्मों तुम फिर-आशा शर्मा

जन्मो तुम फिर से 
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अगर तुम्हारा रूप अब 
सुन्दर नहीं रहने दिया गया है 
और तुम्हें कुरूप भी 
समझा जा रहा है, तो 
तुम जन्मो फिर से!
इस बार माँ की कोख से नहीं 
अपितु अपनी स्वयं की ऊर्जा से 
अपने मन में अंतर्निहित ऊर्जा से 
अपने स्वाभिमान से 
लो एक नया आकार 
खुद का ही नूतन अवतार 
नयी प्रभा से ओतप्रोत 
एक नया आविष्कार 
हो जाओ तुम फिर से 
नया संगीत, नयी झंकार 
समेट लो अपने बिखराव को 
और जन्मो तुम पुनः 
बन एक नवीन अनुपम दृश्य 
जन्मो तुम फिर से 
नवदुर्गा का वह रूप बनकर 
जिसे अब तक 
किसी ने देखा नहीं था 
उस संसार में 
जहाँ तुम रहती हो l
हाँ जन्मो तुम फिर से 
एक परिष्कृत रूप में 
जिसका निर्धारण तुमने किया हो 
और हो जाओ मुक्त 
उन सभी आडंबरपूर्ण अलंकारों से 
जिन्होंने तुम्हारा रूप 
सँवारा कम 
बिगाड़ा ज्यादा 
और दूर करते गये तुम्हें स्वयं से 
छीना तुम्हारे मन की स्मिता को 
और लांछन लगाया तुम्हीं पर 
ताकि तुम 
जीवन भर प्रश्न 
करती रह जाओ स्वयं से ही 
और उत्तर कभी न पाओ l
तो सुनो!
अब छोड़ दो उत्तर माँगना 
और जन्मो तुम फिर से 
स्वयं की एक कृति बनकर 
तुम्हारे ही संसार में 
अब रूप नया कर लो अपना 
और जीयो अपना जीवन 
तुम्हारा अपना जीवन 
जिसमें तुम्हारी संवेदनाएँ हैं 
तुम्हारी परिकल्पनाएं हैं 
और तुम स्वयं हो 
अपने उत्साहवर्धन के लिए 
आत्मरंजन के लिए 
स्व-विमोचन के लिए 
और अपने जीवन के लिए 
तो अब आह्वान है तुम्हारा 
हे शक्ति-स्वरूपा!
न रहो निरीह अब 
हाँ..जन्मो तुम फिर से!
रचनाकार- डॉ.आशा शर्मा, सहायक अध्यापक, उच्च प्राथमिक विद्यालय खड्डा, कुशीनगर l

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