#अखंडगहमरी
भीमराव अम्बेडकर दलितों के दुश्मन और पूंजीवाद के समर्थक थे। उन्होंने आरक्षण के नाम पर दलितों को एक करने का दिखावा किया, लेकिन असल में उनके बीच एक बहुत बड़ी सामाजिक खाई बना दी, जिसे आज हर कोई देख सकता है। दलित उत्थान के नाम पर आरक्षण को इस देश में महज 10 वर्षों के लिए लागू करने की बात कही गई, लेकिन यह कहीं नहीं लिखा गया कि जो व्यक्ति एक बार आरक्षण का लाभ ले ले, उसका परिवार हमेशा के लिए इस दायरे से बाहर हो जाए। इसका सीधा नुकसान उन्हीं दलितों को हुआ जिनके नाम पर यह पूरी व्यवस्था खड़ी की गई थी। कुछ लोग लगातार आरक्षण का लाभ लेते गए, उनकी पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थिति सुधरती गई, लेकिन जो सबसे पीछे थे, वे आज भी वहीं खड़े हैं। जो व्यक्ति एक बार सरकारी अधिकारी बन गया, वह न सिर्फ समाज की मुख्य धारा में आ गया बल्कि अपने पूरे परिवार को पढ़ाने-लिखाने, आगे बढ़ाने और सक्षम बनाने की स्थिति में आ गया, तो फिर उसे बार-बार आरक्षण की क्या जरूरत? आरक्षण तो अब उस व्यक्ति को मिलना चाहिए जो आज भी सक्षम नहीं है, जो आज भी दबा-कुचला है। लेकिन राजनीति में भी यही खेल चलता रहा, जो एक बार विधायक या सांसद बन गया, उसकी आने वाली पीढ़ियाँ भी उसी आरक्षण का लाभ उठाती रहीं, तो फिर बार-बार उसी परिवार को आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने का अधिकार क्यों दिया जाए? यह अधिकार तो उसी वर्ग के दूसरे जरूरतमंद व्यक्ति को मिलना चाहिए। लेकिन भीमराव अम्बेडकर की मंशा कुछ और ही लगती है, वे एक चतुर खिलाड़ी की तरह यह सब समझते थे कि उनकी नीतियों से समाज के भीतर एक स्थायी विभाजन खड़ा होगा। उन्हें पता था कि आने वाले समय में पीछे छूटे लोग उन्हें भगवान बना देंगे और आरक्षण की सही समझ के बिना उसके नाम पर जीने-मरने को तैयार रहेंगे।
आने वाले वक्त में पीछे रहे दलित समाज के लोग उनको भगवान बना देगें और आरक्षण को ठीक से न समझ कर उनके लिए जीने मरने को तैयार रहेगें।
उन्हें देवताओं के तरह पूजेगें, स्थिति भले यह हो जाये कि उनके समर्थक उनको जोकर बना दें जो आज हो रहा है
और आज वही हो रहा है। असली जरूरतमंद अब भी लाइन में है और लाभ वही उठा रहा है जो पहले ही आगे निकल चुका है।
*अखंड गहमरी*
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