बिहार का मुंगेर जिला जो अपनी ऐतिहासिक विरासत ,सांस्कृतिक धरोहर के साथ साथ औद्योगिक जिले के रूप मे जाना जाता है। गंगा तट पर बसे मुंगेर जिले के रेलवे स्टेशन पर एक युवक अखंड प्रताप सिंह उतरता है ।अपने घुमक्कड़ी स्वभाव के चलते वह मुंगेर घूमने के लिए आया है। जैसा विदित है की सभी लोग सबसे प्रसिद्ध जगह घुमना चाहते है तो उसने एक पर्ची बनायी थी की पूछे कहां सबसे पहले जाया जाय कई लोगो से पूछने पर लोग सही जवाब नही देते। उसे परेशान देखकर एक युवती ममता नाम की उसकी पर्ची देखकर बताने लगती है। उसको बोलते देखकर अखंड का दिल खंड खंड होने लगता है। मुंगेर घुम कर वह गहमर तो आ जाता है लेकिन उसे लगता है की वह कुछ मुंगेर मे छोड आया है। अभी वह दिल की उलझनो मे लगा वह यह सोचने लगता है की उसकी जैसी लडकी मिले तो उसे हीरोइन लेकर ,मै फिल्म बनाना शुरु कर दूं।
यही सब सोच-विचार करके नये नये विचार बनते बिगडते रहते है। एक दिन गहमर रेलवे स्टेशन पर एक व्यक्ति अपनी पत्नी इन्दु देवी के साथ मां कामाख्या का दर्शन करने आये थे ।लेकिन सुबह-सुबह कोई सवारी ना मिलने पर परेशान थे । तभी वहां अखंड प्रताप सिंह अपने पसंदीदा पान को खाने रेलवे-स्टेशन पर आते है। उन दम्पति को देखते है ।उनकी परेशानी देखकर वह मदद करके कहा पहले आप मेरे साथ मेरे घर चलो चाय नाश्ता करो फिर तब तक मै सवारी का इंतजाम करता हूं। उनके बार बार मना करने के बाद भी वह उनको अपने घर ले आता है। घर पहुंचने पर देखते है की चाय नाश्ता तैयार है। तो अखंड की माता सरोज जी कहती है ।मुझे पता है यह स्टेशन गया है तो कोई ना कोई आयेगा जरूर दोनो दम्पत्ति आश्चर्य चकित हो जाते मां बेटे का ऐसा प्यार देखकर। पिता अशोक सिंह से बातचीत करके वह डाक्टर दम्पति मां कामाख्या के दर्शन करते है। वह अखंड से पूछते है कया काम करते हो तो अखंड जवाब देते है बस आप जैसे परेशान लोगो को चाय नाश्ता कराता और मां कामाख्या के दर्शन कराता हूं। वह लोग कहते यह तो बडा नेक काम है । फिर पूछते है और कोई काम? तो अखंड का जवाब होता है । बदमाश दुष्टों को सही रास्ते पर लाता हूं।
इन्दु देवी जी पूछती है ।खाने पीने मे कया पसंद है। तो वह कहते पान की दुकान खोली थी वह चली नही इसलिए खुद ही सारे पान खतम करते - करते पान खाने की आदत पड गयी। गंगा किनारे पैदा हुआ हूं बस गंगा का जल ही पीता हूं। ऐसे उट- पटांग जवाब सुनकर वह लोग शान्त हो जाते है। लेकिन जाते जाते वह एक निर्णय करके जाते है।
वह निर्णय सरोज सिंह और अशोक सिंह से बातचीत करके अपनी बेटी ममता के लिए अखंड का साथ का होता है। अखंड इसी इंतजार थे की उस मुंगेर वाली से कैसे दुबारा मिले। इसलिए वह मुंगेर फिर से जाता है वहां मिल जाते है डाक्टर दम्पति वह खुश होकर पूछते है बेटा यहां अचानक कैसे तो वह चिढ़कर कहता है । यहां बंदूक बनती है ना वही खरीदने आया हूं। डाक्टर साहब हंसते है अच्छा है सैनिको का तो जेवर है बंदूक जाओ जाओ लेकर जाओ। इन सब बातो के संग ममता और अखंड की
गोद भराई ,शगुन की प्रकिया चलती रहती है। अंततः 25 फरवरी का दिन आता है । जब ममता , ममता अखंड प्रताप सिंह बनकर गहमर आ जाती है। पारिवारिक आयोजन और संस्कारो के पूर्ण होने पर जब अखंड की नजर ममता पर पडती है तो वह बोल उठता है मेरी फिल्म तो बन गयी। तब से अब तक पच्चीस वर्षो के अंतराल मे हीरोइन ममता संग अखंड की फिल्म चल रही है । साथ साथ साहित्य संस्कृति कला के आयोजन ,स्वास्थ्य सेहत का संदेशपरक काम लगातार प्रगति पर है। दोनो को वैवाहिक जीवन के पच्चीस वर्ष के संग साथ की हार्दिक बधाई बधाई बधाई शुभकामनाए।
ज्योति किरण रतन
लखनऊ

0 टिप्पणियाँ