बिहार की सरिता बनी साहित्‍य सरोज आयरन लेडी 2026

 कुछ पल ऐसे होते हैं जिनकी कल्पना मात्र से सिहरन होने लगती है। उनकी ज़िन्दगी में एक ऐसा ही पल आया, जिसने खुशी और ग़म दोनों को एक साथ ला खड़ा किया। जब ऐसी परिस्थितियाँ दूसरों के साथ बनती हैं तो किसी हद तक उन्हें झेलना आसान होता है, लेकिन जब इंसान खुद ही दोनों भूमिकाओं में हो तो वह पल असहनीय बन जाता है। ऐसा ही कुछ उनके साथ हुआ। उन्हें पहली बार माँ बनने का सौभाग्य मिलने वाला था, लेकिन उसी समय उनके पिता डॉ. सुनील सिंह का निधन हो गया। रिश्तेदारों के आने के बाद उनका अंतिम संस्कार अगले दिन होना था, और उसी समय उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। एक तरफ पिता की अर्थी उठने की तैयारी, दूसरी तरफ बेटी प्रसव पीड़ा से कराहती हुई अस्पताल में। परिवार समझ ही नहीं पा रहा था कि क्या करे। उम्र भी क्या रही होगी—जब पिता की मृत्यु के समय उनकी उम्र 45 वर्ष थी, तो बेटी की उम्र का अंदाज़ आप स्वयं लगा सकते हैं।

ससुराल पक्ष के बारे में भी पहले बताया जा चुका है कि वहाँ कोई विशेष सहारा नहीं था, सिवाय पति के। सास-ससुर का साथ भी नाममात्र का ही था, और ससुर तो अपने ही मिज़ाज के मालिक थे। संयोग देखिए कि जिस शहर में पिता का अंतिम संस्कार हो रहा था, उसी शहर के अस्पताल में मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर बेटी ऑपरेशन के लिए तैयार की जा रही थी। अंततः उसे एक सुंदर और स्वस्थ बालक के रूप में प्रथम पुत्र प्राप्त हुआ। लेकिन उस समय न खुशी थी, न उत्सव, न उल्लास—केवल आँखों में ग़म के आँसू थे और पिता को खोने का दर्द।लेकिन नियति यहीं नहीं रुकी। कहा जाता है कि हर नारी के मन में एक सपना होता है—एक अच्छा परिवार, कमाता हुआ पति, बच्चे और अपनी प्रतिभा को दिखाने की स्वतंत्रता। उनके पास भी यह सब कुछ था, लेकिन केवल नाम के लिए। ससुराल में पहली और एकमात्र बहू होने के कारण उनकी ज़िन्दगी पृथ्वी की तरह निरंतर घूमती रही।

हाई स्कूल और इंटर प्रथम श्रेणी से पास करने वाली यह लड़की परिवार की जिम्मेदारियों में उलझती चली गई। कभी अरुणाचल, कभी भागलपुर, कभी पचरूखी, कभी वापी, कभी उज्जैन—कभी इस शहर तो कभी उस शहर भागती हुई अपने कर्तव्यों को निभाती रही।वर्ष 2006 में उन्होंने अपने पीहर में ज़िन्दगी को स्थिर करने के उद्देश्य से एक ब्यूटी-पार्लर की स्थापना की। तन-मन से समर्पित होकर उन्होंने उस इलाके में काम शुरू किया, जहाँ उस समय श्रृंगार कराना भी किसी अपराध की तरह माना जाता था। उन्होंने न केवल महिलाओं को सजने-संवरने की कला सिखाई बल्कि उनमें स्वरोज़गार की भावना भी जगाई।लेकिन यहाँ भी नियति ने साथ नहीं दिया। पूरी तरह से जम चुका कारोबार परिवार के दबाव में समेटना पड़ा और उन्हें भागलपुर जाना पड़ा।

कहा जाता है कि जो कर्मठ होते हैं वे न कभी शांत बैठते हैं और न अपनी प्रतिभा को मरने देते हैं। सरिता सिंह ने भी यही साबित किया। उन्होंने भागलपुर में एक पियाजियो एजेंसी में छोटे से पद पर काम शुरू किया। अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने बहुत कम समय में वहाँ अपनी अलग पहचान बना ली।यही नहीं, उन्होंने अपने लिए एक ऑटो भी निकलवाया और उसे भागलपुर की सड़कों पर दौड़ा दिया। इसके बाद सफलता की एक नई कहानी शुरू हुई। धीरे-धीरे ऑटो की लाइन लग गई। भागलपुर में सरिता सिंह एक नए ट्रेंड की तरह उभरने लगीं। उन्होंने बिना किसी विशेष सहयोग के अपनी मेहनत से अपना नाम, अपनी पहचान और अपनी प्रतिभा को स्थापित किया।

लेकिन एक बार फिर किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। परिवार के दबाव के कारण उन्हें न सिर्फ नौकरी छोड़नी पड़ी बल्कि अपने खून-पसीने से खड़ी की गई ऑटो की पूरी श्रृंखला भी समाप्त करनी पड़ी। इस घटना ने उन्हें भीतर तक निराश कर दिया, लेकिन उन्होंने अपनी कार्यक्षमता को कभी नहीं छोड़ा।परिवार, पति और रिश्तेदारों के सुख-दुख को समझने वाली इस लड़की के मनोभावों और इच्छाओं को समझने वाला कोई नहीं था। हर कोई अपनी-अपनी सोच में डूबा हुआ था।

एक समय ऐसा आया जब यह चंचल और उड़न परी-सी लड़की मानसिक अवसाद में चली गई। उसका शरीर बीमारियों का घर बनता जा रहा था, लेकिन उसने हार नहीं मानी।एक बार फिर उसने खुद को संभाला और एक छोटी-सी जगह पर साड़ियों का कलेक्शन सेंटर शुरू किया। अपनी मेहनत से उसने उसे जीरो माइल और सबौर इलाके में पहचान दिला दी।लेकिन नियति ने यहाँ भी धोखा दिया। वह जगह सरकारी योजना के अंतर्गत आ गई और उसे तोड़ना पड़ा।इसके बाद उसने अपनी ज़िन्दगी की पूरी पूँजी लगा दी—यहाँ तक कि अपने गहने-जेवर भी बेच दिए—और सबौर बाज़ार में लगभग 25 लाख की लागत से ब्यूटी-पार्लर और साड़ी सेंटर शुरू किया। दुकान में अच्छी कलेक्शन थी, अच्छी बिक्री भी हो रही थी। लेकिन एक समस्या थी—दुकान और घर के बीच दूरी।इसका समाधान उन्होंने खुद स्कूटी चलाना सीखकर निकाला। लेकिन परिवार के दबाव और परिस्थितियों के कारण यहाँ भी उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा और अंततः यह कारोबार भी समाप्त हो गया।

इस बार दुख और भी गहरा था। न केवल मेहनत चली गई बल्कि एक महिला की सबसे प्रिय चीज़—उसके गहने तक चले गए।लेकिन जिन परिस्थितियों में बड़े-बड़े लोग टूट जाते हैं, उन परिस्थितियों में फिर से खड़े होने वाली महिला का नाम है—सरिता सिंह। यदि उन्हें “आयरन लेडी” कहा जाए तो यह किसी भी प्रकार की अतिशयोक्ति नहीं होगी।उसका कारण जानकर शायद आपके पैरों तले ज़मीन खिसक जाएगी।

भागलपुर के अटल बिहारी सेतु के पार गोपालपुर डिवीजन में उनके ससुराल की पुश्तैनी सैकड़ों एकड़ जमीन थी। उस जमीन को वापस पाने की कोशिश में उनके ससुर लाखों रुपये खर्च कर चुके थे, लेकिन सफलता नहीं मिली थी।तब यह जिम्मेदारी सरिता सिंह ने अपने हाथों में ली। दिन-रात कोर्ट-कचहरी, थाना, अमीन और लेखपाल के चक्कर। भूमि विभाग का शायद ही कोई अधिकारी या कर्मचारी होगा जिसके पास वह नहीं गई होंगी। रात-रात भर जागकर कागज़ों को पढ़ना, समझना और दिन भर दफ्तरों के चक्कर लगाना—यह उनकी दिनचर्या बन गई।वह साधारण महिला अब एक अंगार बन चुकी थी। वह रात में भी अकेले निकल पड़ती थी, बिना किसी डर के।आख़िरकार उनकी मेहनत रंग लाई। भागलपुर से पटना तक नेताओं और अधिकारियों से मिलते हुए उन्होंने एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण जीत हासिल की। कुछ जमीन अपने नाम करवाने में वह सफल रहीं और एक बड़े भूखंड पर अपने अधिकार का दावा भी स्थापित कर दिया।आप समझ सकते हैं कि दबंगों के बीच से जमीन का एक टुकड़ा निकालना कितना कठिन होता है।

ज़िन्दगी की सारी खुशियाँ, सारे सपने, समाज क्या कहेगा—इन सब बातों से परे उनका लक्ष्य केवल एक था—परिवार का मान-सम्मान बचाना।पैसे के पीछे वह कभी नहीं भागीं, बल्कि पैसा हमेशा उनके पीछे भागता रहा। लेकिन हर बार उनकी सोच और उनके सपनों पर परिवार की इच्छाएँ भारी पड़ जाती थीं।सरिता सिंह की सबसे बड़ी ताकत उनकी कर्मठता, उनकी सोच और निर्णय लेने की क्षमता थी।आज भी उनके जीवन में ठहराव नहीं है। पति दिल्ली में, बेटा जयपुर में, सास-ससुर भागलपुर में—ज़िन्दगी लगातार शहर बदलती रही।इसी बीच बेटी लंबे समय से हाथ के दर्द से परेशान रही और सास के इलाज की चिंता अलग। इन सबके बीच सरिता सिंह खुद भी एलर्जी और थायरॉयड जैसी बीमारियों की चपेट में आ गईं।

डॉ. सुनील सिंह की प्रथम पुत्री सरिता सिंह—वह महिला जिसने हर क्षेत्र में खुद को साबित किया और यह दिखाया कि एक अकेली महिला क्या-क्या कर सकती है—आज मानो पत्थर-सी हो गई है।न सुख का असर, न दुख का प्रभाव—जो है, बस वही है।45 वर्ष की इस महिला की ज़िन्दगी अब जैसे दूसरों के लिए ही समर्पित हो गई है। अपने सपने जैसे कहीं पीछे छूट गए।

लेकिन इतना निश्चित है कि वह एक सफल मार्गदर्शक और कर्मठता की प्रतिमूर्ति हैं। उन्होंने न केवल अपने ससुराल बल्कि अपने पीहर को भी संभाल कर रखा। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने पुत्र की तरह जिम्मेदारियाँ निभाईं। ननद बिमारी में आ गई उसको इलाज में लाया, उसकी मृत्‍यु के बाद उसके परिवार को संभाला। बस पीड़ा यही है कि सबको संभालते-संभालते उन्होंने खुद को ही कहीं खो दिया—अपने अस्तित्व को, अपने सपनों को।ऐसी आयरन लेडी के सम्मान में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एवरग्रीन लेडी नतमस्तक है। उनकी ज़िन्दगी के कई चरणों की सैकड़ों तस्वीरें एवरग्रीन लेडी की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं, जो उनकी संघर्षपूर्ण कहानी को स्वयं बयान करती हैं।




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