मासी, बस यहीं खड़े रहते हैं ना-रेणु बाला


24 दिसंबर की सर्द सुबह थी। मैं अपनी बहनों, बेटे मानित और भांजे वंश के साथ बांके बिहारी गली में खड़ी थी।

भीड़ इतनी कि पैर रखने की जगह नहीं। दिसंबर की ठंड थी, पर मंदिर की गली में घुसते ही एक अलग ही गर्माहट महसूस हुई। चारों तरफ "राधे राधे" जय श्री राधे की गूंज और हाथों में फूल-माला और प्रसाद लिए भक्त।

मंदिर में धक्के लग रहे थे, पुजारी जी बार-बार कह रहे थे"चलते रहो, दर्शन करते चलो"। पर मेरा भांजा वहीं जम

गया। जैसे ही पर्दा हटा और बांके बिहारी जी की तिरछी चितवन दि खी, उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया और बोला — "मासी, बस यहीं खड़े रहते हैं ना। कहीं नहीं जाना।" उसकी  आँखें बिहारी जी से हट ही नहीं रहीं थीं।

सच कहूं तो सिर्फ भांजा ही नहीं, हम सब भी वहीं रुक जाना चाहते थे। वो मनमोहनी मूरत, वो सांवला सलोना रूप,

वो तिरछी मुस्कान — एक बार देखो तो पलकें झपकाना भी भूल जाएं। पर्दा गिरता, कुछ सेकंड बाद फिर उठता और हर बार ऐसे लगता जैसे पहली बार देख रहे हैं। मन बार-बार करता था कि बस एक झलक और मिल जाए।

बहनें हाथ जोड़े खड़ी थीं, बेटा टकटकी लगाए देख रहा था, और मैं ...मैं तो बस निहार रही थी । उस पल समझ आया, लोग क्यों कहते हैं कि "बिहारी जी का दर्शन करने से पेट नहीं भरता"। हम भीड़ में से पीछे जाकर खड़े हो गए ताकि हम कुछ देर और बिहारी जी के सुंदर  सलोने रूप के दर्शन कर सकें।

पुजारी जी बार-बार बोल रहे थे कि दर्शन करो और जल्दी-जल्दी बाहर चलो । भांजा अब भी बुदबुदा रहा था —"मासी थोड़ी देर और रुकते हैं"।

बड़ी मुश्किल से हम बाहर निकले पर वंश वापस दर्शन करने के लिए अदंर चला गया मेरी और बहनों की आँखें तो नम थीं पर मन में दर्शनों का अपार  सुख था । 24 दिसंबर की वो सर्द सुबह, वो भीड़, वो धक्के — सब याद से मिट गए। याद रही तो बस वो तिरछी चितवन।

वृंदावन से लौट आए, पर मन वहीं छूट गया। सच कहते हैं— एक बार जो बिहारी जी को देख ले, वो फिर उनका हो जाए। आज भी बिहारी जी की

 मनमोहनी मूरत मन में बसी हुई है।

जय श्री राधे

रेणु बाला जीरकपुर

9217217153


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