आजादी की लड़ाई में भीमराव अम्बेडकर का योगदान आपको तलाशने से भी नहीं मिलेगा। एक तरफ जहां भारत के युवा, समृद्ध और बच्चे देश को आजाद कराने के लिए तरह-तरह के संग्राम और आंदोलन कर रहे थे, वहीं भीमराव अम्बेडकर अंग्रेजों के साथ मिलकर केवल दलित उत्थान की बात करते नजर आते थे। वह भारत में रहते हुए अंग्रेजों के सहयोगी के रूप में काम करते रहे। देश की आजादी की लड़ाई के इतिहास में ऐसा कोई आंदोलन नहीं है जिसमें भीमराव अम्बेडकर का नाम, शुरुआत करने तो दूर, सहभागिता में भी आता हो। जहां भी उनका नाम आता है, वह केवल दलित उत्थान से जुड़ा मिलता है।
उनकी मानसिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने दलितों के लिए अलग वोटिंग की मांग की। एक ने दलितों के लिए अलग राष्ट्र की बात की और एक ने अलग वोटिंग सिस्टम की।
1942 जब पूरे भारत में स्वतंत्रता संग्राम की आग थी। विरोध था, वह अंग्रेज़ो की चाटुकारिता में लगे थे।
जहां हर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन में था, वहीं अम्बेडकर अंग्रेज सरकार में Viceroy Executive Council में लेवर मेम्बर बने जो आज के दौर में लेबर मंत्री पद जैसा होता था।वह इस पद पर 1946 यानि अंग्रेजी हूकूमत के आने तक थे।
अब आप ही बताइये भारत गुलाम, अंग्रेजी हूकूमत की कम्पनी, उनका आफिस, कम्पनी का बना हर सामान विदेशीयों के लिए तो यह सीधा अंग्रेज़ो के हित की बात है कि नही?
दूसरी बात कोई भी मंत्री जो भी नियम बनायेगा उसमें 80 प्रतिशत हित कम्पनी अपना नहीं देखेगी तो क्या वह नियम बालों करेगी।
तीसरी बात क्या इतिहास में इस बात का जिक्र नहीं मिलता है कि अंग्रेजों ने दलितों के साथ अत्याचार नहीं किया, उनको मजदूरी दिया, उनका लगान माफ किया, उनको इज्जत दिया। मुझे तो ऐसा कहीं नहीं दिखा। फिर कैसे दलित उत्थान किये। समझ से परे है।
अब आते हैं संविधान पर, जिसके निर्माण में केवल वोट की राजनीति के कारण उनका नाम जोड़ा गया। उनके द्वारा बनाया गया यह संविधान एक मिक्स वेज सब्जी की तरह है, जिसमें आरक्षण को छोड़कर अपना कुछ नहीं है। अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, आयरलैंड और सोवियत संघ जैसे देशों से लिया गया है। यह संविधान भारत के विनाश के लिए तैयार किया गया।
संविधान में कहीं भी किसी की जिम्मेदारी, सजा और समय सीमा स्पष्ट रूप से तय नहीं है। दुनिया जानती है कि अयोग्य व्यक्ति किसी भी देश, राज्य या स्थान के विकास में सहायक नहीं हो सकता। इसके बाद भी दलित प्रेम की आड़ में आरक्षण रूपी व्यवस्था से विकास की जड़ काट दी गई। शिक्षा, इंजीनियरिंग और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में कम अंक पाने वालों को नौकरी देकर इन क्षेत्रों के विकास की संभावना को समाप्त कर दिया गया। न योग्यता बचेगी, न विकास होगा।
गधे को शेर की खाल पहनाकर अगर शेरों के साथ दौड़ाया जाए, तो वह शेर नहीं बन जाता। इसी तरह आरक्षण के माध्यम से अयोग्यता को बढ़ावा दिया गया। भीमराव अम्बेडकर यहीं नहीं रुके, उन्होंने पदोन्नति और शिक्षा में भी आरक्षण लाकर भारत के विकास में अंतिम चोट कर दी।
*अखंड गहमरी*
9451647845
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