मेरी एक परिचित हैं। उनका नाम है उमा गुप्ता। वैसे तो वो मुझसे उम्र में काफी बड़ी हैं। उनसे मुलाकात तो सोशल मीडिया के जरिए ही हुई थी। लेकिन कभी भी ऐसा नहीं लगा कि वो मेरी करीबी नहीं हैं। धीरे धीरे उनसे बातें होने लगी। पहले मैसेज में फिर आहिस्ता आहिस्ता फोन पर हमारी बातें शुरू हो गई। कुछ ही समय में उनसे इतनी आत्मीयता हो गई, एक गहरा जुड़ाव हो गया उनके साथ। वो बिल्कुल एक मां की तरह मेरी बातों को समझती और मुझे सही सलाह भी दिया करती थी। कुल मिलाकर उनके साथ एक अनकहा रिश्ता अब एक खूबसूरत मोड़ ले चुका था। मैं उनसे अपनी लगभग हर बात शेयर किया करती थी। फिर कुछ ऐसा हुआ कि मैं भी अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गई और बहुत समय तक उनका भी कॉल नहीं आया। पर इस ओर मैने ध्यान नहीं दिया, और अपनी ही जिम्मेदारीयो में उलझी रही। जब काफी समय हो गया ।
उनकी कोई खबर नहीं मिली तो मेरे मन एक घबराहट सी होने लगी, कि आखिर क्या बात हो गई? किसी अनहोनी की आशंका से मेरा दिल काँप उठा। एक दिन मैने उन्हें फोन मिलाया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया तो मेरी घबराहट और भी ज्यादा बढ़ गई। फिर हिम्मत करके दूसरी बार उनका नंबर मिलाया। इस बार उन्होंने फोन उठा लिया। उनकी आवाज में वो खनक नहीं थी जो हमेशा हुआ करती थीं। एक अजीब सा सन्नाटा था, उनकी खामोशी में भी बहुत अधिक शोर था। जो मुझे रह - रह कर परेशान कर रही थी। उनकी आवाज में स्थिरता थी। जब मैंने उनसे पूछा कि ठीक हो, आपकी तबियत ठीक तो है ना? फ़िर उन्होंने जो कहा, उसे सुन कर तो मेरा खुद पर नियंत्रण ही नहीं रहा। बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला। उन्होंने बताया कि एक महीने पहले ही उनकी तो दुनियां ही उजड़ गई और इसी वजह से वह किसी से भी कोई संपर्क में नहीं है। उनकी बातें सुनने के बाद तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं उनसे क्या ही बात करूं, उन्हें कैसे हिम्मत दूं। दुनियां की कोई भी खुशी उस खुशी के सामने कुछ भी नहीं है जो खुशी उसके जीवनसाथी के साथ होने से मिलती है। उन्हें असमय ही बहुत गहरा आघात लगा था, जिससे उबरना तो आसान नहीं था लेकिन उन्होंने धीरे धीरे खुद को संभाला। उनसे जो भी मिलता उन्हें यही सलाह देता कि अब तुम्हें अपने लिए ना सही पर अपने बेटे के लिए जीना पड़ेगा। वैसे भी अब उनके जीने की एक ही उम्मीद उनका एकलौता बेटा है जिसे उन्हें संभालना भी है और उसकी खुशियों के लिए जीना भी है। उन्होंने ना सिर्फ़ अपने दर्द का सामना किया बल्कि अपने बेटे के लिए फिर से जीना भी शुरू किया।
सोनी बरनवाल "कशिश"
जमुई, बिहार

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