शाश्वत बसन्त-ओम जी मिश्र

 लखनऊ का हृदय कहा जाने वाला हजरतगंज इलाका आज लाल गुब्बारों और गुलाबों की खुशबू से महक रहा था। गोधूलि बेला की सुनहरी रोशनी जब 'गंज' की ऐतिहासिक इमारतों पर पड़ रही थी, तो ऐसा लग रहा था मानो शहर ने खुद प्रेम का सिंदूरी लिबास ओढ़ लिया हो। हर तरफ जोड़े हाथ में हाथ डाले घूम रहे थे, मानों समय को कुछ पलों के लिए रोक लेना चाहते हों। इसी भीड़ के बीच खड़ा था युवा आर्यन, जिसके हाथ में एक सुंदर गुलदस्ता था और आँखों में अपनी प्रेमिका अंजली के लिए अगाध प्रेम।अंजली ने उसके कंधे पर सिर टिकाया और धीरे से पूछा, "आर्यन, क्या ये चमक, ये गुलाब और ये एहसास हमेशा ऐसे ही रहेंगे? अक्सर सुना है कि वक्त के साथ भावनाओं की तीव्रता कम हो जाती है, क्या हमारा प्रेम भी एक दिन बस एक जिम्मेदारी बनकर रह जाएगा?"

आर्यन कुछ कहता, उससे पहले ही उसकी नज़र पास ही खड़े एक वृद्ध दंपत्ति पर पड़ी। सफेद बाल, चेहरे पर झुर्रियों का गहरा जाल, लेकिन आँखों में वही ताज़गी और शरारत जो किसी नव-विवाहित जोड़े में होती है। वे एक-दूसरे का हाथ थामे नहीं थे, बल्कि उनके चलने के ढंग में एक ऐसा तालमेल था जैसे दो देह एक ही प्राण से संचालित हो रहे हों।आर्यन ने संकोच छोड़कर उन वृद्ध सज्जन के पास जाकर पूछा, "बाबा, आज के इस दौर में जहाँ रिश्ते कांच की तरह ज़रा सी चोट से टूट जाते हैं, आप दोनों के बीच इस 'सदाबहार वसंत' का राज़ क्या है? आपने समय के पतझड़ को अपने आँगन में आने से कैसे रोका?"

बुजुर्ग ने अपनी पत्नी की ओर देखते हुए एक ऐसी मुस्कान बिखेरी जिसमें आधी सदी का संतोष था। वे मंद स्वर में बोले: "बेटा, प्रेम केवल एक दिन का उत्सव या आकर्षण का ज्वार नहीं, बल्कि पूरी उम्र का 'धैर्य' है। हमने कभी एक-दूसरे को अपनी पसंद के सांचे में ढालने की कोशिश नहीं की, बल्कि एक-दूसरे के बदलावों को अपनी नियति मानकर स्वीकार किया।"उन्होंने आगे कहा, "जवानी में हम एक-दूसरे के चेहरे को निहारते थे, अब हम एक-दूसरे की जरूरतों को पढ़ लेते हैं। जब इसके (पत्नी की ओर इशारा करते हुए) घुटनों में दर्द होता है, तो लाठी मैं बनता हूँ, और जब मेरी याददाश्त धुंधलाने लगती है, तो ये मेरी स्मृतियों का दर्पण बन जाती है। बस यही एक-दूसरे में विलीन हो जाने का नाम प्रेम है।"

उनकी पत्नी ने आर्यन और अंजली की आँखों में झांकते हुए ममता भरे स्वर में जोड़ा, "और याद रखना बेटा, फूल की पंखुड़ियां तो शाम तक बिखर जाती हैं, पर समर्पण की खुशबू रूह में बस जाती है। कभी संवाद (बातचीत) के द्वार बंद मत करना। जब नाराज़गी हो, तो चिल्लाने के बजाय करीब बैठकर बात करना, क्योंकि मौन अक्सर उन गलतफहमियों को खाद देता है जो रिश्तों की जड़ें खोखली कर देती हैं।"अंजली और आर्यन को अपने सवाल का जवाब मिल गया था। उन्हें समझ आ गया कि:

 * प्रेम प्रदर्शन  में नहीं, बल्कि मौन समर्पण में बसता है।
 * सच्चा रिश्ता वह नहीं जिसमें झगड़े न हों, बल्कि वह है जो हर झगड़े के बाद और मज़बूत होकर उभरे।
 * सम्मान और अटूट संवाद ही वह खाद-पानी है, जो किसी रिश्ते की बुनियाद को 'शाश्वत वसन्त' बनाए रखता है।उस शाम हजरतगंज के उस 'हृदय कुंज' में केवल युवा जोड़े ही नहीं थे, बल्कि दो पीढ़ियों का एक ऐसा महामिलन था, जहाँ पुराने अनुभवों ने युवा उत्साह को जीवन जीने का सही व्याकरण सिखा दिया था। अब आर्यन के हाथ का वह गुलदस्ता केवल फूलों का गुच्छा नहीं, बल्कि उम्र भर साथ निभाने के वादे की एक छोटी सी शुरुआत लग रहा था।


ओम जी मिश्र 'अभिनव'
 लखनऊ
94500 82362


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