प्यार का बाजार- मुकेश कुमार

सुहानी बसंत ऋतु का आगाज़ हो चुका था। पेड़ों पर नवकोंपल निकलने लगें थे। बागों में कलियां चटकने लगीं थीं। पुष्पों पर भौंरे मंडराने लगे थे। खेतों सरसों के पीले पीले फूल मन को लुभाने लगें थे। अलसी के नीले फूल, गेहूं के पौधों में लगी हरी-हरी बालियां,आम के पेड़ों पर लगे मंजर और कोयल का पंचम तान छेड़ना ऋतुराज बसंत के आगमन को अत्यंत मनोहारी बना रहे थे। ऐसे में प्रेम का इजहार और इकरार न हो,यह कैसे हो सकता है।युवक-युवतियां एक दूसरे को रिझाने के प्रयास में लगे थे। फूलों के गुच्छे,पाटल पुष्प और तरह-तरह के उपहारों के आदान-प्रदान के द्वारा सभी अपने-अपने प्रेम को प्रकट करने में लगे थे। बसंतोत्सव अपने चरम पर था। पर सभी युवक-युवतियों के भीड़ से अलग एक ऐसा भी युवक था जिसे लगता था कि वह किसी का प्रेम प्राप्त नहीं कर सकता। हालांकि वह दिल से तो बहुत अमीर था, परंतु इसके विपरीत आर्थिक रूप से अत्यंत गरीब था। इतना गरीब कि उसके शरीर पर ढंग के वस्त्र भी नहीं होते थे।  ‌प्रतिदिन भरपेट भोजन भी प्राप्त नहीं होता था।कालेज की फीस उसके कुछ दोस्त आपस में चंदा करके भर देते थे, जिससे वह अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था। वह अपने आप को प्यार के बाजार में दिलों के खरीद-फरोख्त के काबिल नहीं समझता था। इसलिए तो जब सभी युवक-युवतियां, बाल बालाएं यहां तक कि प्रौढ़ और वृद्ध भी बसंतोत्सव के मौके पर अपने-अपने दिलों जोर आजमाइश कर रहे थे, वह इस भीड़ से अलग-थलग खड़ा अपनी किस्मत पर चार-चार आंसू रो रहा था।

मगर कहते हैं कि ईश्वर के यहां देर है पर अंधेर नहीं है। जब वह बसंतोत्सव मेले से अलग हटकर एक पेड़ के नीचे बैठकर अपनी फटी किस्मत को कोस रहा था। दूसरी ओर एक रमणी हाथों में पुष्पगुच्छ लिए बसंतोत्सव मेले के एक सिरे से दूसरे सिरे तक कई चक्कर लगाती किसी को ढूंढ़ रही थी। उसे देखकर सभी छैले नजरें ऊंची किए ललचाई नज़रों से देख रहे थे और इसका इंतजार कर रहे थे कि वह उनके पास आए और उनके प्यार को स्वीकार करे। परंतु वह रमणी सबको नजरंदाज करते हुए मेले का कई चक्कर लगाकर परेशान हो चुकी थी। शाम ढलने वाली थी।वह मेले के अंतिम छोर पर आकर खड़ी उदास नजरों से किसी को ढूंढ़ रही थी।उसे देखकर लगता था कि अब रो देगी। तभी उसकी नज़र मेले की भीड़ से दूर बगीचे में पेड़ के नीचे बैठे उस युवक पर पड़ी।उसकी खुशी की सीमा नहीं रही, मानों मुंहमांगी मुराद पूरी हो गई हो।वह दौड़कर उस युवक के पास गई और उससे लिपटकर प्रेम की इजहार किया। उसके हाथों में पुष्पगुच्छ देकर प्यार जताया और उसका हाथ पकड़कर बसंतोत्सव मेले में प्यार के बाजार में चली गई।


रचनाकार :--

मुकेश कुमार दुबे "दुर्लभ" (विद्या वाचस्पति)

शिक्षक सह साहित्यकार, सिवान (बिहार)
95765 35097




एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ