साँस में आज तो, गंध मोहक घुली।
गाँठ मन की प्रिये, आज मन से खुली।।
मौन की बात को, मौन होकर सुनो।
मंजुलें प्रेम की, प्रेम से ही गुनो।
हाथ में हाथ हो, सात जन्मों तलक,
साथ तेरा रहे, आख़िरी साँस तक।
पुष्प से नेह की, पंखुरी है खिली।
गाँठ मन की प्रिये, आज मन से खुली।।
देखकर दूर से रूप तेरा कभी।
पीर मिटती हृदय की तभी थी सभी।
बावरा मन हुआ, आज अतिशय मगन,
प्रेम की लग गई, रूह को है लगन।
एक ही राग में, प्रीति रस में ढली।
गाँठ मन की प्रिये, आज मन से खुली।।
गीत 'अभिनव' हृदय, पर लिखो तुम प्रिये।
प्यार का दीप ही, अब जलाओ हिये।
दो हृदय एक हो, मिल गए हैं यहाँ,
धन्य है आज तो, प्यार का ये जहाँ।
भोर की लालिमा, भाल पर है मली।
गाँठ मन की प्रिये, आज मन से खुली।।
ओम जी मिश्र 'अभिनव'
लखनऊ

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