महिलाओं पर बढ़ता मानसिक दबाव -दीपमाला


नारी सशक्तिकरण के लिए सरकारी एवं सामाजिक स्तर पर निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं, जिनके सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। आज हर दौड़ में, हर मोड़ पर नारियाँ अपना परचम लहरा रही हैं। जहाँ कभी नारियाँ केवल चूल्हा-चौका तक सीमित मानी जाती थीं, वहीं आज वे घर की दहलीज से बाहर निकलकर हर क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। वे यह सिद्ध कर रही हैं कि कोई भी कार्य ऐसा नहीं है, जिसे वे कर न सकें।

किन्तु इसके साथ-साथ यह भी सत्य है कि वर्तमान समय में महिलाओं पर मानसिक दबाव निरंतर बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं।

सबसे पहला कारण पारिवारिक व्यवस्था है। समाज ने आरंभ से ही एक ऐसी पारंपरिक व्यवस्था बना दी, जिसमें घर के सभी कार्य—जैसे कपड़े धोना, बर्तन साफ करना, झाड़ू-पोंछा, बच्चों व परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल—महिलाओं की जिम्मेदारी माने गए, जबकि पुरुषों को आर्थिक जिम्मेदारी और बाहर के कार्य सौंपे गए। समय के साथ इस व्यवस्था में परिवर्तन आया और महिलाएँ भी आर्थिक रूप से परिवार का सहयोग करने लगीं, परंतु घर के कार्यों की जिम्मेदारी में अपेक्षित कमी नहीं आई। परिणामस्वरूप महिलाएँ बाहर और भीतर—दोनों ही मोर्चों पर काम करने लगीं। इस दोहरी जिम्मेदारी के कारण समय का समुचित नियोजन कठिन हो जाता है और मानसिक दबाव उत्पन्न होता है।

दूसरा महत्वपूर्ण कारण कार्यस्थल का वातावरण है। मानसिक संतुलन बनाए रखने में यह अत्यंत आवश्यक होता है कि जिस स्थान पर हम कार्य करते हैं, वहाँ का वातावरण और सहकर्मियों का व्यवहार सहयोगात्मक हो। परिवार के बाद कार्यस्थल ही वह स्थान है, जहाँ हम अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं। यदि वहाँ अपमानजनक या अमानवीय व्यवहार हो, मनोबल गिराने वाले लोग हों या हर कार्य में कमी निकालने की प्रवृत्ति हो, तो यह मानसिक तनाव का बड़ा कारण बन जाता है, भले ही हम अपना कार्य पूरी निष्ठा से कर रहे हों।

तीसरा कारण समय की कमी है। आज शायद ही कोई व्यक्ति यह कहता हो कि उसके पास पर्याप्त समय है। हम सोशल मीडिया पर मित्र तो बना लेते हैं, परंतु बचपन की सच्ची सहेलियों से दूरी बढ़ जाती है। परिवार के वे सदस्य, जिनसे हम मन की बातें साझा करते थे, उनसे भी व्यस्तता के कारण संवाद नहीं हो पाता। अपनी बात न कह पाना भी मानसिक दबाव को बढ़ाता है, जबकि केवल खुलकर बातचीत कर लेने से ही मन का बोझ काफी हल्का हो जाता है।

चौथा कारण एकल परिवार की बढ़ती प्रवृत्ति है। पहले संयुक्त परिवारों में जिम्मेदारियाँ बँटी रहती थीं, परंतु अब एकल परिवारों में पति-पत्नी और बच्चों की सारी जिम्मेदारी सीमित लोगों पर आ जाती है। छोटे बच्चों की देखभाल—जैसे उन्हें समय पर भोजन कराना, दूध पिलाना, उनकी दैनिक आवश्यकताओं का ध्यान रखना—महिलाओं के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य बन जाता है, जिससे मानसिक दबाव बढ़ता है।

पाँचवाँ कारण महिलाओं की शारीरिक संरचना है। प्रकृति ने महिलाओं को माता बनने का सुख प्रदान किया है, परंतु इसके साथ मासिक धर्म, गर्भावस्था और प्रसव के बाद का समय शारीरिक व मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है। उचित सहयोग और अनुकूल वातावरण न मिलने पर चिड़चिड़ापन और मानसिक थकान बढ़ जाती है।

छठा कारण तकनीक और सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रभाव है। आज हम कितने ही व्यस्त क्यों न हों, सोशल मीडिया के लिए समय निकाल ही लेते हैं। वहाँ दिखने वाले बनावटी रिश्ते, भावनात्मक शून्यता और गलत मार्गदर्शन कई बार महिलाओं को मानसिक रूप से भ्रमित कर देता है। भावनात्मक रूप से संवेदनशील होने के कारण महिलाएँ इस चक्रव्यूह में फँस जाती हैं, जो मानसिक परेशानी का कारण बनता है।

निवारण

महिलाओं के मानसिक संतुलन के लिए सबसे आवश्यक है परिवार का सहयोग। यदि महिलाएँ बाहर काम करती हैं, तो पुरुषों को भी घरेलू कार्यों में बराबरी से हाथ बँटाना चाहिए। इससे समय का बेहतर नियोजन होता है और पति-पत्नी एक-दूसरे को समय दे पाते हैं, जिससे संवाद और समझ बढ़ती है।

महिलाओं को भावनात्मक रूप से मज़बूत बनने की आवश्यकता है। शारीरिक थकान तो किसी तरह संभाली जा सकती है, परंतु भावनात्मक सहारे के अभाव में अकेलापन और चिड़चिड़ापन बढ़ता है। बेहतर है कि महिलाएँ स्वयं को मानसिक रूप से सशक्त बनाएँ और अपने आत्मबल को पहचानें।नियमित योग और ध्यान शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी हैं। योग से शारीरिक समस्याएँ दूर होती हैं और ध्यान से भावनात्मक स्थिरता आती है। इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए।

वर्कप्लेस पर “ना” कहना सीखना भी आवश्यक है। अतिरिक्त कार्यभार को हर बार स्वीकार करना मानसिक और शारीरिक थकान को बढ़ाता है। आवश्यकता होने पर विनम्रता से मना करना आत्म-सम्मान और संतुलन दोनों के लिए ज़रूरी है।अपने लिए समय निकालना सबसे महत्वपूर्ण है। चाहे गृहिणी हो या कामकाजी महिला, हर किसी को अपनी रुचियों के लिए थोड़ा समय अवश्य निकालना चाहिए—चाहे वह संगीत हो, नृत्य हो, मनपसंद भोजन हो या कोई रचनात्मक कार्य। यही समय आत्मिक ऊर्जा प्रदान करता है। 

अंततः, हर परिस्थिति में खुश रहने का प्रयास करना चाहिए। खुशी के लिए बड़े कारण नहीं, छोटे-छोटे पल ही पर्याप्त होते हैं। महिलाओं का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पूरे परिवार और समाज की उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक है। विशेषकर विवाह के बाद बदलती दुनिया में पति-पत्नी का आपसी सहयोग और समझ महिलाओं के संपूर्ण स्वास्थ्य की आधारशिला है।

  दीपमाला वैष्णव 

कोंडागांव,cg 

9753024524



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