फाल्गुन का महीना था। बरसाने की गलियाँ अबीर-गुलाल से रंगीन थीं। ढोलक की थाप पर गली-गली गूँज रहा था । “फाग खेलन बरसाने आए हैं, नटवर नंद किशोर!” नौ साल का आरव पहली बार मम्मी, पापा और दादी के साथ बरसाने आया था। वह चारों ओर की रंग-बिरंगी भीड़ देखकर हैरान था। लोग हँस रहे थे, नाच रहे थे और आपस में मिठाइयाँ बाँट रहे थे। दादी ने कहा, “बेटा, आज लड्डू होली है और आज यहाँ लड्डू बरसेंगे।” आरव की आँखें गोल हो गईं। “लड्डू बरसेंगे? बादलों से?” उसने विस्मित होकर पूछा। माँ मुस्कुरा दीं, “नहीं शरारती! श्रद्धालुओं पर मंदिर की छत से पंडितों द्वारा लड्डू फेंके जाते हैं।”
मंदिर के प्रांगण में आरव ने देखा कि ऊपर से रंग-बिरंगे लड्डू हवा में उड़ रहे हैं। किसी को माथे पर लगे, किसी को कंधे पर। सब हँसते-हँसते झूम रहे थे और गा रहे थे—“राधे-राधे, जय-जय राधे!” ढोलक की थाप गूँजी और लड्डू की बौछार शुरू हुई।एक सुनहरा लड्डू आरव के सिर पर आकर गिरा। “वाह! आसमान से मिठाई गिरी!” वह चहक उठा। पास ही कुछ बच्चे दौड़ रहे थे—कोई लड्डू पकड़ रहा था, कोई गिरा हुआ उठाता। तभी आरव ने देखा कि एक छोटा बच्चा पीछे रह गया है और खाली थैली लिए खड़ा है।
आरव ने अपना लड्डू दो टुकड़ों में बाँटा और आधा उसे दे दिया। बच्चे ने मुस्कुराकर कहा, “तू सच्चा दोस्त है यार!” तभी दोनों पर एक और लड्डू गिरा, जो सुनहरे मोती की तरह चमक रहा था। दादी बोलीं, “ये राधा रानी का आशीर्वाद है बेटा।”आरव ने आँखें मूँदीं और पल भर को उसे लगा कि मंदिर की छत पर खड़ी राधारानी मुस्कुरा रही हैं। उनके हाथों से फूल और मिठास बरस रही थी। फिर दादी ने लड्डूमार होली की कथा सुनाई—कैसे द्वापर युग में बरसाना में यह परंपरा शुरू हुई और आज तक निभाई जा रही है।
मंदिर के बाहर खिलौनों की दुकानों पर बच्चे और बड़े रंग-बिरंगी पिचकारियाँ देख रहे थे। मिठाई की दुकानों से खुशबू आ रही थी। आरव ने सोचा, काश रोज़ ऐसी मिठास बरसती।शाम को आरव बोला, “दादी, अब समझ गया—होली सिर्फ़ रंगों की नहीं, मिठास और प्रेम बाँटने की भी है।” दादी मुस्कुराईं, “यही है ब्रज की असली भावना, जहाँ हर मुस्कान एक प्रसाद बन जाती है।” आरव ने आकाश की ओर देखा। उसे लगा जैसे तारे भी अबीर में नहा रहे हों और हवा में राधा रानी की मधुर हँसी गूँज रही हो—जहाँ मिठास बाँटते हैं बच्चे, वहीं बसती है ब्रज की सच्ची होली।
प्रियंका खंडेलवाल (ब्रज बाला)
माखन चोर की नगरी (मथुरा)
82799 01673

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