जागरूक महिला- ज्‍योति

 मातृशक्ति हमारे भारत की पुकार है और हमारे देश की पहचान भी। संसार को रचने वाली यही मातृशक्ति है, जिसके कारण जीव-जंतु, पेड़-पौधे और मानव सभी अपना आकार लेते हैं। परोपकार की मूर्ति कही जाने वाली स्त्री—महिला—आज इतनी उत्कृष्ट होते हुए भी क्यों मजबूर है? इसका कारण क्या है? आज इन्हीं प्रश्नों के उत्तर मैं अपने इस लेख के माध्यम से आप लोगों के बीच रखना चाहती हूँ।

घर से दफ़्तर तक, धरा से आकाश तक उड़ान भरने वाली हम महिलाएँ आज अपने अस्तित्व को जीवित रखते हुए भी मानसिक दबाव से गुजर रही हैं। न जाने क्यों, हर क्षेत्र में अग्रसर होते हुए भी स्वयं को पिछड़ा हुआ पाती हैं। अपने पतन का कारण हम स्वयं को ही समझने लगती हैं, जबकि इसका मूल कारण कुछ और ही है।वास्तव में, हम महिलाओं की सबसे बड़ी दुश्मन महिला स्वयं ही बन जाती है।एक महिला जब आगे बढ़ती है, तो दूसरी महिला उसकी खुशी में खुश होने के बजाय जलन से भर जाती है। यह जलन का धुआँ इस कदर फैलता है कि मानो पर्यावरण प्रदूषण से भी अधिक यह समाज को दूषित कर देता है।

यह कोई साधारण बीमारी नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक समस्या है। जब कोई सक्षम और जागरूक महिला प्रारंभ से ही अपने घर और समाज की नींव को मजबूत करना चाहती है, अपना योगदान देना चाहती है, तो उसकी राह में रुकावट कोई बाहरी व्यक्ति या पुरुष नहीं, बल्कि कई बार एक अन्य महिला ही बन जाती है—चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हो। उदाहरण स्वरूप—सखी-सहेली, देवरानी-जेठानी, बहन-बहन। ये सभी संबंध कहने को तो एक-दूसरे के पूरक हैं, किंतु आज के खोखले विचारों के चलते एक-दूसरे के विरोधी बनते जा रहे हैं। 

यही कारण है कि महिलाएँ आगे बढ़ते हुए भी मानसिक तनाव से गुजरती हैं और स्वयं को सक्षम समझते हुए भी सहमी और डरी हुई महसूस करती हैं। यह डर उनका कुछ स्थायी नुकसान नहीं करता, किंतु कुछ क्षणों के लिए उनका मानसिक संतुलन अवश्य बिगाड़ देता है। इसी अवस्था में वे अपने आगे बढ़ने वाले कदम को पीछे छोड़ देती हैं। जितनी तेजी से वे स्वयं को आगे बढ़ाती हैं, उतनी ही तेजी से उन्हें पीछे धकेल दिया जाता है। यही सब कारण आज हमारे समाज और परिवार की नींव को कमजोर कर रहे हैं। कहा गया है कि यदि मकान की नींव मजबूत हो, तो मकान कभी नहीं गिरता। किंतु यहाँ तो नींव मजबूत होते हुए भी मकान में जंग लगने लगती है। अर्थात एक नारी खड़ी तो सामर्थ्यवान होती है—तेजस्वी और सक्षम होती है—परंतु विपरीत और नकारात्मक विचारों के कारण वह अपनी धैर्यता खो बैठती है।और कभी-कभी तो मानसिक चिंतन की आग इतनी बढ़ जाती है कि उसकी चिता तक सज जाती है

ज्योति सिंह
वाराणसी ( उत्तर-प्रदेश)
87368 43807



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