महिलाओं पर बढ़ता मानसिक दबाव-मुकेश कुमार

महिलाएं सामाजिक व्यवस्था की रीढ़ होती है। पृथ्वी और महिला को एक समान कहा गया है। दोनों में असीम सहनशक्ति होती है। अतुलनीय सुझबुझ, धैर्य, सहनशीलता, सामाजिक व्यवस्था का भार उठाने में सक्षम और सृष्टि की कुशल संचालिका होती है। परंतु इतना सब होने के बावजूद महिला सामाजिक प्रताड़ना की शिकार और मानसिक दबाव से ग्रस्त होती है। यह महिला जीवन की विडंबना हमारी सामाजिक व्यवस्था में जहां आदिकाल से महिलाएं  यत्र नार्यस्तु पुज्यंते, रमंते तत्र देवता: से महिमा मंडित होती रही है वहीं अग्निपरीक्षा और चीर-हरण की शिकार भी होती रही है। जहां पुरुष की सारथी बनकर उसके दुख-सुख की सहचरी रही है वहीं बलात् स्वयंवर विवाह और अपहरण की शिकार भी होती रही है। वर्तमान काल इससे अछूता नहीं है।

आज जब नारी सामाजिक बंधनों को तोड़कर महिला सशक्तिकरण की मिसाल पेश करते हुए हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है वहीं गृह कलह, घरेलू हिंसा, सामाजिक प्रताड़ना, बलात्कार, अनाचार, दुराचार की शिकार भी हो रही है। आज शिक्षा,संचार, विज्ञान, आध्यात्म, चिकित्सा, राजनीति, अंतरीक्ष,जल,जल, सेना, सर्वत्र अपने प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली महिलाएं कामकाजी होकर, संयुक्त परिवार की बेड़ियों को तोड़ते हुए गृह, परिवार, कार्यस्थल, सबको सम्हालते हुए सर्वत्र बहुविध यातनाओं का शिकार होती हैं और मानसिक दबाव में आ जाती है।

आज की महिलाएं भरसक अपने परिवारजनों (सास-ससुर, माता-पिता,पति, बच्चे) के दिए कार्यों को पूर्ण करने का प्रयास करती हैं। दूसरी ओर समाज, हाट-बाजार, चौक-चौराहों, शैक्षणिक संस्थाओं और कार्यस्थल पर अपने दायित्वों का निर्वहन करतीं हैं। परंतु अपने शारीरिक स्वास्थ्य और बनावट के कारण पुरुषवादी मानसिकता की शिकार होती हैं। स्त्री लोलुप मनुष्य उसे अपनी विलासिता और भोग का साधन समझकर उसके साथ अत्याचार और बर्बरतापूर्ण व्यवहार करने से पीछे नहीं हटता।इन सभी दायित्वों और सामाजिक शोषण को सहन करते हुए मानसिक दबाव में आकर आत्महत्या तक कर बैठतीं हैं।


मुकेश कुमार दुबे "दुर्लभ" (विद्या वाचस्पति) 

शिक्षक सह साहित्यकार, सिवान (बिहार) 

95765 35097



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