मेरी घुमक्कड़ी।
घुमना तो हर कोई चाहता है ।मै चाहूं तो कुछ अलग नही है । घर -परिवार, काम के बीच सामंजस्य बैठाते बैठाते कुछ अवसर मिल जाते जिसे काम कम घुमना या घुमना कम काम कह सकते है क्योकि दोनो एक दूसरे के पूरक है।
ऐसे ही तीन दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए रीवा मध्य प्रदेश जाने का अवसर मिला । समूह मे जाने की बात हुई। लेकिन मेरा विचार से वह लोग दोपहर की गाडी से जाने वाले थे और मैने कामकाजी एक छुट्टी बचाने के विचार से अकेले शाम की गाडी से जाने का तय किया। एक महीने पहले टिकट लेकर जाने का दिन समय तय हो गया। जब तय दिन स्टेशन पहुंची तो देखा की समूह मे जाने वाले आधे से ज्यादा लोग स्टेशन पर थे । आश्चर्य हुआ सबको वहां देखकर। बात करने पर पता लगा की सबकी व्यस्तता थी तो जाने का समय बदला ।अच्छा लगा की सब मिल गये । चित्रकूट एक्सप्रेस से चल दिये रात के तीन बजे सतना स्टेशन पर उतरना था ,तय आयोजन के अनुसार रीवा से बस लेने आने वाली थी। लेकिन वह नही आयी तो शिकवे शिकायत का दौर चलने लगा ,निष्कर्ष मे इन्टरसिटी से टिकट लिया और पहुँच गये गाते बजाते रीवा । हां गाते बजाते क्योकि जाने वाले सभी कवि -लेखक थे तो सफर तो बोर नही होने वाला था। कवियो को भी भरपूर मौका था अपनी कविताओ को सुनाने को श्रोताओ के पास ट्रेन छोड़कर जाने का कोई विकल्प नही था। रीवा स्टेशन पहुँचकर ढलानदार लम्बे पुल को पार करके बाहर निकले । जहां बस ने प्रदेश, महिला पुरूष के अनुसार अलग-अलग ठहराए गये। सुबह दिनचर्या पूर्ण करके कार्यक्रम स्थल पर पहुँच गये पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविद के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे। सबके साथ परिचय को दौर चला । औपचारिक उद्घाटन के पश्चात ग्यारह प्रदेशो की संस्कृति का आदान प्रदान हुआ। लेकिन घूमना सिर्फ मेरा अकेले के मष्तिष्क मे नही था सभी के एक जैसे भाव थे। शाम तक धीरे धीरे लोग निकल पडे घूमने ।मै महिलाओ मे अकेले लखनऊ से गयी थी तो समझ नही आया कैसे कहां जाये । फिर भी चल पडी अकेले पैदल रीवा की सडको पर टहलने लोगो से बातचीत करते हुए। टहलते टहलते रीवा की मुख्य बाजार मे पहुँच गयी । कुछ विशेष स्थानीय सड़क किनारे के खाने की जानकारी ली। बाजार को देखा शहर मे राजा रानी के महल के अतिरिक्त और कया है देखने का पता किया ।वापस अधिवेशन स्थल पर आ गयी रात्रि भोजन के बाद वापस विश्वविद्यालय परिसर के महिलाओ के आवास पर चल दी जहां मिली लखनऊ की एक और महिला प्रतिभागी मजा आ गया क्योकि हम लोग पहले से परिचित थे। अब तो एक और एक ग्यारह हो गये। दूसरे दिन पुरूष वर्ग के आधे से ज्यादा वह सभी जो अपनी गाडियो से थे, उनके साथ मिलकर लोग मैहर देवी दर्शन करने चल दिये । एक बार भी किसी ने साथ की मात्र दो महिलाओ से चलने के लिए नही कहा ।एक बार मन को बुरा लगा। फिर दिमाग से ऐसे लोगो को झटक कर अकेले ही घूमने का मन बना लिया। चल पडी झरनो के शहर रीवा के झरने देखने । आस पास के झरने देखकर वापस आ गयी। बारिश के ना होने से झरने सूखे मिले । लेकिन रीवा की सफाई व्यवस्था ने मन को हर लिया। तीसरे अंतिम दिन घूमने के लिए साथ की दूसरी महिला पहले नही जाने को तैयार थी ,लेकिन मेरी दृढ़ता देख वह भी चल दी। एक आटो ई रिक्शा तय करके रीवा का राजमहल, महाकाल मंदिर , जगन्नाथ मंदिर, वैदिक संस्कृत विद्यालय, बिछिया नदी ,तमसा नदी , बीहर नदी के किनारे जल से आचमन किया । रीवा का ऐतिहासिक संग्रहालय मे मूर्तिकला, चित्रकला आदि की ऐतिहासिक धरोहरो को देखा । संग्रहालय जिसे सभी को देखना चाहिए था ,लेकिन अधिवेशन से मात्र पांच प्रतिशत लोग ही वहां पहुचे। कुछ जानकारी का अभाव कुछ साधन की जानकारी का अभाव कारण हो सकता है । मैने हमेशा की तरह इस बार भी रीवा पहुँचने से वहां की समस्त जानकारी एकत्र कर ली थी इसलिए कम समय मे घूमना की ललक और अधिवेशन का कार्य दोनो एक साथ पूर्ण कर लिए। यादो के ढेर सारे पिटारे और जानकारी का संग्रह मन मस्तिष्क मे लेकर रीवा से प्रयागराज ,प्रयागराज मे ठंड की रात प्लेटफार्म पर बिताकर सुबह रायबरेली अपने कर्म क्षेत्र पर जाकर हस्ताक्षर करके लम्बी सांस के साथ रीवा की यात्रा को समाप्त किया।
ज्योति किरण रतन
लखनऊ
94159 10781
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