रंजना नदी के किनारे बालू पर बैठी लहरों का आना -जाना और उठना- गिरना एकटक हो कर देख रही थी। उसका ध्यान कहीं और था। सूरज डूब रहा था , उसकी परछाई नदी में पड़रही थी।
लहरों के उठने गिरने से ऐसाप्रतीत होता था, जैसे सूरज सर्दी से काँप रहा हो , पास में उसकी बेटी नीलम जिसकी उम्र 5 साल थी, बालू से घर बना रही थी। घर बनाती फिर बिगाड़ देती। अच्छा नहीं बना दूसरा बनाती हूँ।
रंजना का ध्यान उधर गया नीलम खड़ी थी और उसने एक पैर के ऊपर बालू का ढेर लगा लिया था।
बालू से पैर खींच लिया "देखो माँ अँधेरी गुफा बन गई।"
"हाँ नीलम देख लिया'" रंजना बोली
घर बनाना आसान नहीं, लेकिन तोड़ देना कितना आसान है । "क्यों नीलम सही कहा '" रंजना ने कहा
नीलम कुछ समझी नहीं। नीलम का घर बनाना और तोड़ देना खेल था, लेकिन जीवन की यह कड़वी सच्चाई रंजना सहन नहीं कर पा रही थी। क्योंकि उसने अपना घर टूटते देखा है।
"नीलम चलो घर चलते हैं अँधेरा हो रहा है दादी प्रतीक्षा कर रही होंगी"और नीलम का हाथ पकड़कर लम्बे -लम्बे
- डग भरती हुई वह घर की ओर चल पड़ी।
"बेटी कहाँ चली गयीं थी।
अँधेरा हो गया,दिया बत्तीकर लो मुझे तो कुछ मिला नहीं"। रंजना ने कुप्पी जला कर रख दी। और नीलम और सास जी को खाना परोस दिया" माँजी आप खा लो नहीं तो फिर आपको पचता नहीं है"। "नीलम तुम भी जल्दी खाओ और सो जाओ सुबह स्कूल जाना है"
। कुप्पी बुझा दी ताकि मिट्टी का तेल बचा रहे, रंजना ने नीलम को सुला दिया। सासू भी अपनी चारपाई पर लेट गई। रंजना लेट गई मगर उसे नींद नहीं आ रही थी ,करवटें बदलती रही। अन्दर से बड़ी बेचैनी सी हो रही थी, वह उठकर दालान में बैठ गई शायद ठंडी हवा लगे तो नींद आ जाए।
नींद आँखों से उड़ चुकी थी। बीच में नीलम कुनबुनाई रंजना ने उसे फिर से सुलाने का प्रयास किया। "मम्मी पापा कब आयेंगे दिवाली पर पटाखे लायेगे'" नीलम बोल पड़ी लेकिन रंजना ने उसे अनसुना कर दिया और कहा "सो जाओ"
वह नीलम को कैसे बतायें पापा की करनी जीवन से खिलवाड़ धोखा ,छल ,कपट सब कुछ तो किया। विश्वास की डोरी शादी के बाद घर में कदम रखते ही टूट गई।
नीलम सो गई और रंजना फिर से दलान में बैठ गई हवा ठंडी थी आँखें बन्द कर ली। आँखें बन्द करते ही जीवन की बीती घटनाओं का चलचित्र आँखों के सामने घूमने लगा।
किस तरह से पीयूष ने उसे धक्के मार कर घर से निकाला तथा बिलखती हुई नीलम को घर से बेधर होगयी। इतना छल और प्रपंच करता रहा पर मुझे आभास ही नहीं हुआ।गृहस्थी विश्वास प्२ टिकी रहती हैं,डोर टूटी परिवार बिखरा।
मोबाइल की रिंग टोन अभी भी कानों में गूँज रही है।उसदिन पियूष गलती से मोबाइल भूल गयाथा। मोबाइल की रिग टोन जिन्दगी भर नही भूल सकती ।गाना बज रहा था 'दुनियाँ एक नम्बरी मै दस नम्बरी ।
उसे शादीके पूर्व की घटना याद आयी ,वह कॉलेज से लौटी थी कमरे में भीड़ दिखाई दी वह घबरा गयी । बाबूजी बदहवास से लग रहे थे तथा माँ रो रही थी। लुट गए बर्बाद हो गए अब क्या ?होगा। उसे मालूम पड़ा बाबू जी से गहना बनाते समय सोने की बिस्किट पीट रहे थे ।बिस्किट उछल कर बाहर चली गई फिर ना मिली। सुनार ने नौकरी से निकाल दिया, तथा हर्जाना भी माँगा। रोजगार छिन गया अब क्या ?करें। रंजना ने पढ़ाई बन्द कर दी माँ बीमार रहने लगी और घुट -घुट कर एक दिन हम लोग को छोड़ कर चली गई। माँ के निधन से बाबूजी टूट गए हम लोग गाँव आ गए और वही पर वह सुनार के यहाँ काम करने लगे।बावूजी को मेरी शादी की चिन्ता खाये जारही थी ।बिना दहेज लड़का कहाँ? मिले। रिश्तेदारो के कहने पर अखबार में विज्ञापनदिया। विज्ञापन निकलने के 1 हफ्ते के भीतर पीयूष अपने दो दोस्तों को लेकर आया तथा मुझे पसन्द कर लिया शादी तय हो गई। पीयूष ने बाबूजी को बताया वह सरकारी मुलाजिम है खाद्य विभाग में। अकेला है ना कोई आगे है और ना कोई पीछे। निश्चित तारीख के दिन आया और मन्दिर में शादी हो गई
रंजना दिल्ली आ गई। हर लड़की के सपने होते हैं वैसे ही मेरे सपने भी थे। कमरा खुलते ही जो मैंने देखा लगा आसमान फट पड़ा। लगता था महीनों से झाड़ू नहीं लगी खाली बोतलें झूठे बर्तन सभी इधर उधर पड़े थे। कहने लगा मैं तो सोच रहा था तेरा बाप रुपए देगा एक ही लड़की है सीधे आकर होटल में रुकेंगे रूम बुक भी कराया था, मगर अब पैसा कौन भरे साले भिखमंगे की लड़की ले आया धोखे से ।सफाई कर लेते हैं। नई दुल्हन मुँह दिखाई की जगह झाड़ू लगा रही थी। सफाई कर सोने की जगह बनायी । खाना बाजार से आया। सुबह होते ही पीयूष चले गए काम से जा रहा हूँ। उधारी लेने वालों का सिलसिला शुरू हुआ। गाली गलौज मारने की धमकी सब कुछ सुना, यह क्या दिमाग काम नहीं कर रहा था। ड्राई क्लीनर्स के यहाँ से आदमी आया और वह शादी का सूट लेकर चला गया ,बोला किराए पर लाए थे। इतना बड़ा धोखा। रात को पियूष लौटा पिये हुए । पूछा तो,,'" कहने लगे तुम ,कौन होती हो पूछने वाली जैसे रखूँ वैसे रहो ज्यादा बोलोगी तो जवान खींच लूँगा कर दे अपने बाप को, खबर रुपए भेजें नहीं तो लड़की ले जा"
धीरे-धीरे प्याज के छिलके की तरह परत उतरती गई।नशा खोर और जुआरी।
सोचा गाँव चली जाऊँ पता लगाया पिताजी वृद्धा आश्रम चले गए। अब रोज का काम पिटती रही सहती रही। जाँऊ तो कहाँ?
काम करना शुरू कर दिया मोहल्ले के बच्चे स्कूल ले जाती और लाती । बर्तन मॉजती तब रोटी मिलती।
इसी बीच दो बार गर्भ से हुई । एबॉर्शन करा दिया बच्चा नहीं चाहिए। नीलम जब गर्भ में आई पीयूष को बताया नहीं। समय जब ज्यादा हो गया तब वह अपना काम न कर सका। नीलम उसे फूटीआँख नहीं सुहाती थी।
दो तीन बार कहा बाप से जाकर पैसे ला।मै समझा अकेली बेटी है पैसा मिलेगा लेकिन वह तो खुद भिरव मंगा है।
जीवन भारी लगने लगा लेकिन नीलम की ममता मुझे कुछ करने से रोक लेती। धीरे-धीरे मालूम पड़ गया था उसकी माँ है नेपाल के एक गाँव में रहती हैं।वही का है पीयूष गाँव में किसी लड़की को छेड़ा तो गाँव वालों ने मार कर भगा दिया। गाँव में घुसा तो जिंदा नहीं बचेगा। दिल्ली भाग आया और यहाँ करने लगा धोखा तथा छल।
उस दिन तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा पीयूष से गलती से मोबाइल घर पर ही छूट गया। रिंग बजी मोबाइल उठाया उधर से आवाज आई "सुनो जी,, आप आ रहे हो कि मैं आऊं मुन्नी बीमार है'
, मैं समझी रॉन्ग नंबर है मैंने पूछा आप कौन बोल रही हैं किससे काम है। उधर से उत्तर आया पीयूष जी से काम है मैं उनकी पत्नी बोल रही हूँ। वह कहाँ हैं ?आप कौन हो?। लगा किसी ने खोलता हुआ लावा कान में डाल दिया मोबाइल ऑफ कर दिया आगे सुनने की हिम्मत न थी।
रात को पियूष घर लौटा पूछा तो उबल पड़ा मेरा" मोबाइल छुआ क्यों तुम कौन प्रश्न करने वाली''।"मैतुम्हारी पत्नी हूँ मेरा अधिकार है।"रंजना ने कहा
"मैं देता हूँ अधिकार" हाथ पकड़कर घर से निकल दिया दरवाजा बन्द कर लिया ।रात का समय कहॉ जाऊँ ले जा इस औलाद को नीलम को बाहर भेज दिया।उसी समय एक बूढ़ी माँ घर के बगल से निकली "बेटी मैने सब सुन लिया भगवान किसीको नालायक औलाद न दें,चल मेरे साथ "मै गाँव आगयी नीलम केसाथ सारी घटना रंजनाने सास को बता दी। घर के पीछे जमीन का टुकडा था ।सब्जी करने लगीं।बीए सेकंड ईयर पास किया था। गाँव की बच्चियों को पढ़ाने लगी। नीलम को सरकारी स्कूल में भर्ती कर दिया।
तभी नीलम ने आवाज दी ।रंजना की तन्द्रा टूटी वर्तमान में लौट आयी।माँ जी सोई नही थी ,"रंजना ने पूछा माँ जी जाग २ही हो क्या बात है? कुछ नही बेटा जैसे तुझे नींद नही आरही वैसे मुझे।
भगवान बे औलाद रखे ऐसी औलद किसी का ना दे।
रंजना सास के पास बैठ गयी।एक "बात बतायेगी आप दिल्ली कैसे पहुँची,आपके पास पता कहाँ से आया ?।"
'"माँजी बोली गॉव का रामू दिल्ली में साब केघर रवाना बनाता है वह सारे समाचार देता था।उसी के साथ आगयी अब सुधरगया होगा यह सोच कर"
ममता खींच ले गयी नातिन की ।
हेभगवान औलाद हो तो सुपात्र।नही बॉझ भली।
रंजना बोली" मैं आपका बेटा हूँ यह समझ लीजिए मैं करुँगी आपकी सेवा '"
"बेटा परसों दीपावली है हम धूमधाम से मनाएंगे'"
सास ने कहा
" मगर माँ जी पैसे कहाँहैं ?बच्चों ने भी दिवाली के बाद पैसा देने के लिए कहा है" रंजना बोली
'" मेरे पास हैं" यह कह कर वह उठी और एक डिब्बी रंजना के हाथ पर रख दी।
'" माँ जी इसमें तो एक अँगूठी है'"
हाँ इसे तू बेच दे तुम्हारे ससुर जी ने मुँह दिखाई दी थी"
"मैं अपनी नातिन की दिवाली धूमधाम से मनाऊँगी'"
रंजना कुछ बोल ना सकी चुप हो गई इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी ना था।
वह कहने लगी मैं अब निराश्रित नहीं मेरा अपना घर है, अपनी माँ है और अपनी सास के गले लिपट गई दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।
श्रीमती उषा चतुर्वेदी एडवोकेट
बीएम 57
करुणाधाम आश्रम के सामने
नेहरू नगर भोपाल
462003

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