भिलाई पावर हाउस में छात्रों पर हमला: क्या अब भी प्रशासन जागेगा नहीं?

भिलाई पावर हाउस में छात्रों पर हमला: क्या अब भी प्रशासन जागेगा नहीं?
आज मेरा मन बेहद व्यथित और आक्रोश से भरा हुआ है। मेरे दोनों बच्चे सीईटी परीक्षा देने के लिए ट्रेन से भिलाई पावर हाउस, छत्तीसगढ़ गए थे। वे अपने भविष्य के सपनों को लेकर उत्साहित थे, लेकिन रास्ते में उन्हें जिस भयावह अनुभव से गुजरना पड़ा, उसने एक मां के दिल को झकझोर कर रख दिया।
ट्रेन में कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा मेरे बच्चों को लगातार परेशान किया गया। उन्होंने अभद्र व्यवहार किया, डराने-धमकाने की कोशिश की और माहौल इतना असुरक्षित बना दिया कि बच्चे मानसिक रूप से भयभीत हो गए। दुर्भाग्य की बात यह है कि स्टेशन पर उतरने के बाद मामला और भी गंभीर हो गया।
उन अपराधी तत्वों ने मेरे बेटे पर चाकू से हमला कर दिया। हमले में उसके पैर में चोट लगी और उसे तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा। ईश्वर की कृपा रही कि चोट ज्यादा गहरी नहीं थी, लेकिन जिस प्रकार से वह युवक चाकू लेकर मेरे बेटे के पीछे दौड़ा, वह दृश्य किसी भी माता-पिता को अंदर तक हिला देने वाला है। यदि उस समय ऑटो चालक ने तुरंत साहस और समझदारी न दिखाई होती, तो यह हमला मेरे बेटे के पेट पर हो सकता था और परिणाम बहुत भयावह हो सकते थे।
यह केवल मेरे परिवार की पीड़ा नहीं है, बल्कि समाज और प्रशासन के लिए एक गंभीर चेतावनी है। आखिर सार्वजनिक स्थानों, रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में अपराधियों का इतना मनोबल क्यों बढ़ चुका है? छात्र-छात्राएं, महिलाएं और आम नागरिक आखिर कब तक डर के साए में सफर करेंगे?
आज मेरा प्रशासन से सीधा सवाल है—
रेलवे और स्थानीय प्रशासन यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में असफल क्यों दिखाई दे रहा है?
स्टेशन और ट्रेनों में असामाजिक तत्व खुलेआम कैसे घूम रहे हैं?
क्या किसी बड़ी घटना का इंतजार किया जा रहा है?
परीक्षा देने जा रहे बच्चों तक की सुरक्षा यदि सुनिश्चित नहीं हो पा रही, तो आम नागरिक किस पर भरोसा करे?
मैं प्रशासन से मांग करती हूं कि इस घटना की गंभीर जांच की जाए, दोषियों की तुरंत पहचान कर कठोर कार्रवाई की जाए और रेलवे स्टेशन व ट्रेनों में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जाए। सीसीटीवी निगरानी, पुलिस गश्त और असामाजिक तत्वों पर तत्काल नियंत्रण अब समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
एक मां होने के नाते मेरी यह पीड़ा केवल व्यक्तिगत नहीं है; यह उन हजारों अभिभावकों की चिंता है जो अपने बच्चों को पढ़ाई और भविष्य के लिए घर से बाहर भेजते हैं। हम अपने बच्चों को सपने पूरे करने भेजते हैं, डर और हिंसा झेलने नहीं।
प्रशासन को यह समझना होगा कि सुरक्षा केवल एक व्यवस्था नहीं, बल्कि नागरिकों का मूल अधिकार है। अगर आज भी ऐसे अपराधियों पर लगाम नहीं कसी गई, तो आने वाले समय में कोई और परिवार ऐसी पीड़ा का शिकार हो सकता है।
डाॅ शीला शर्मा 

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