अप्रैल की बारह तारीख को जब यह खबर मिली कि आशा ताई नहीं रहीं तो विश्वास नहीं हुआ। वे सुरों की संभावना ही नहीं, अद्भुत आशा थीं। यह लगने लगा, साज़ खामोश हैं और सुर अधूरे से लग रहे हैं।
आशा ताई! लता दीदी के बाद अगर कोई नाम मां सरस्वती की वीणा का तार हो सकता है तो वह है आशा भोंसले। परन्तु आशा होना इतना भी आसान नहीं था। एक तो एक महान परिवार का सदस्य होना और ऊपर से एक महान गायिका की छोटी बहन होना जो वट वृक्ष सरीखी तमाम संगीत के गलियारों में दूर तक छाई हो। कहते हैं वट वृक्ष के नीचे कुछ नहीं पनपता। ऐसी ही कुछ नियति रही आशा ताई की। परन्तु वो कहते हैं न ! मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए। आशा जी की कर्मठता और सफल होने की जिद्द ही सर्वोपरि थी, जिसने उन्हें उस मंजिल तक पहुंचाया जिसकी कल्पना शायद स्वयं लता दीदी ने भी नहीं की थी।
महत्वपूर्ण यह नहीं होता कि आपने कौन सा रास्ता चुना या आप किन कंधों का सहारा लेकर आगे बढ़े और कौन से शख़्स थे जिनके शब्द आपका संबल बने। महत्त्वपूर्ण है कि आप सफ़ल हुए और केवल सफ़ल ही नहीं आप सफलता की ज़िंदा मिसाल बन गए। आशा भोंसले का जीवन भी ऐसी ही उतार - चढ़ाव वाली सड़क पर चलता, कभी घिसता तो कभी अपने पूरे ज़लाल के साथ नुमाया होता रहा। जिसमें प्रेम साथी बना, कभी घटना तो कभी दुर्घटना भी। परन्तु एक चीज हमेशा साथ रही हौंसला और आगे बढ़ने का जनून। शायद यही जनून था जिसने अंततः आशा भोंसले को एक आइकॉनिक गायिका बना दिया। चाहे उनके हिस्से में लता जी द्वारा ठुकराए हुए गीत ही आए हों परंतु वह गीत ही असल में उनकी पहचान बन गए। और फिर वह गीत कौन सा बुरे थे? उन गीतों के बिना कुछ फिल्मों की कल्पना करना भी मुश्किल है
:• जिंदगी एक सफर है सुहाना...
• आगे भी जाने न तू, पीछे भी जाने ना...
• आइए मेहरबान बैठिए जानेजाँ...
• आओ हज़ूर तुम को सितारों में ले चलें...
• कजरा मोहब्बत वाला, अखियों में ऐसा डाला...
• झुमका गिरा रे, बरेली के बाजार में...
• ये है रेशमी जुल्फों का अंधेरा न घबराइए...
किसी एक को भी फिल्म से निकाल दें तो फिल्म का स्वाद फीका हो जाएगा।यह सच है कि लता जी को बेशुमार इज़्ज़त शोहरत मिली और आशा जी का जीवन लानतों , दुश्वारियों और प्रताड़ना से भरा रहा परन्तु परिवार, बड़ी बहन और अपने प्रेम से खट्टे होते रिश्तों के बीच आशा जी ने न तो जीना छोड़ा और न ही गाना। सफल होने का जनून उनको अंततः सफलतम गायिका बना कर ही रुका।यह सच है कि कोई भी लताजी जैसा नहीं हो सकता परंतु एक सच यह भी है कि आशा जी जैसे परिवार की विपदाओं और प्रेम की भावनात्मक जंग के बीच रह कर भी कोई इतनी खूबसूरती से जीवन को व्यक्त नहीं कर सकता। उन्हीं का एक नगमा है :
चैन से हमको कभी, आपने जीने न दिया, ज़हर भी चाहा अगर, पीना तो पीने न दिया...! यह भी एक इत्तेफाक है कि लता जी का चार साल पहले 92 वर्ष की आयु में देहावसान हुआ और आज आशा जी भी 92 वर्ष में इस फ़ानी दुनिया को छोड़ कर चली गईं। और पीछे छोड़ गईं एक खालीपन... कभी न भरने वाला खालीपन।निकले थे कहां जाने के लिए, पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं...।अलविदा आशा ताई...! सुरों की देवी आशा ताई भले ही देह रूप में विदा हो गई हों, लेकिन उनकी आवाज़ हमारी स्मृतियों में गूंजती रहेगी। क्या भजन, क्या कव्वाली, मुजरा, कविता या क्षेत्रीय गीत अथवा लोकगीत! आशाजी ने हर रंग के गीतों को अपना स्वर सौंदर्य दिया है।
बहुत याद आयेंगी....लाखों करोड़ों लोगों के लिए, आशाजी सिर्फ एक गायिका नहीं, उससे बहुत अधिक थीं। एक ऐसी आवाज थीं जो जिसमें जीवन के अनेक रंग थे और जो उनके साथ पली-बढ़ी और ज़बान पर चढ़ी। " पल दो पल का साथ हमारा... " जैसी कव्वाली होकर तर्क करने आगे आई तो कभी मुजरा बनकर पेशकश हो गई। भजन की कतार में बैठी तो मन को दर्पण दिखा दिया और ग़ज़ल की ग़मक की तो बोल दिया : मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए।
वे कई पीढ़ियों तक याद रखी जाएंगी। आशाजी का जन्म 8 सितंबर, 1933 को सांगली में हुआ था। बड़ी बहन लता के साथ मिलकर उन्होंने कई युगल गीत गाये। उत्सव फिल्म का " बेला महका रे महका... " तो सुरों की गलबहियां का अनूठा उदाहरण है अपनी आवाज से उन्होंने भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग को दीप्तिमान करने में खास योगदान दिया।
एक समय ऐसा भी था जब युवा आशा को डर था कि वह हमेशा अपनी बड़ी बहन की छाया में ही रहेंगी। आशा अक्सर लता मंगेशकर के साथ उनकी यही क्षमता उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। सात दशकों से अधिक के असाधारण करियर में, आशा भोसले ने 12,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए और गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज कराया। वे कमाल थीं। इन रिकॉर्डिंग के दौरान एक तरह का दबाव भी रहता था।
" आजा - आजा... ' और " ओ मेरे सोना रे..." से लेकर प्रसिद्ध गीत " पिया तू अब तो आजा...", " ये मेरा दिल... ", " ये मैं कहां आ फंसी..." से लेकर " चुरा लिया है तुमने जो दिल को... ' तक आशाजी ने हिंदी सिनेमा संसार को कुछ सबसे यादगार और मौलिक गाने दिए।
भारत सरकार द्वारा उन्हें 2008 में पद्म विभूषण और 2001 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अपना पहला फिल्मफेयर पुरस्कार " गरीबों की सुनो... " (दस लाख, 1967) और " परदे में रहने दो..." (शिकार, 1969) के लिए जीता। यही नहीं, 'उमराव जान' और 'इजाजत' जैसी फिल्मों में आवाज देकर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी अपने नाम किए। उनके परलोक गमन पर विनम्र श्रद्धांजलि।
डॉ. प्रिया सूफ़ी
होशियारपुुुर, पंजाब
98786 12556

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