अवसाद कैसे दूर करें-सुनीति

( दो प्रवक्ता विद्यालय में सुबह के खाली समय में पुस्तकालय में बातचीत करते हुए। प्रज्ञा समाजशास्त्र विनीता मनोविज्ञान प्रवक्ता के मध्य संवाद )

विनीता - (पुस्तकालय में प्रवेश करते हुए) सुप्रभात! प्रज्ञा जी प्रज्ञा - नमस्कार ! आज का अखबार तो पढ़ो।

विनीता- आती हूँ!  पहले ऑफिस में हस्ताक्षर तो कर आऊँ।

प्रज्ञा (आग्रह करते हुए)- बहुत आवश्यक विचार-विमर्श करना है जल्दी आना।

विनीता- ( पुनः पुस्तकालय प्रवेश) हाँ बोलो!

प्रज्ञा- पता है आज महाविद्यालय की एक छात्रा ने फांसी लगा  ली है और आज शोक सभा होगी।

विनीता -( गहरी सांस भरते हुए ) ओह ! यह तो बहुत बुरा समाचार है।

वैसे भी ऐसा कोई दिन नहीं जाता , जब समाचार पत्रों में ऐसी खबरें न पढ़ने को मिलें।

न जाने युवा वर्ग, बच्चे , पढ़ा-लिखा शिक्षित वर्ग सभी किस ओर जा रहे हैं ? घोर निराशा में डूबते जा रहे हैं, कौन सी दिशा है?

प्रज्ञा-  यह आप से अच्छा कौन समझा सकता है प्रवक्ता के रूप में।

विनीता-   न जाने परिवार पर क्या बीत रही होगी?

केवल मेरे समझाने से क्या होगा? इस गंभीर स्थिति पर घर ,माता-पिता , परिवार, विद्यालय , शिक्षकों व संस्थाओं को मिलकर कार्य करना होगा।

प्रज्ञा - हाँ यह हमारे समाज के लिए एक अत्यंत गंभीर विषय दुखद   स्थिति है ।

विनीता-  "जब कोई व्यक्ति अधिक समय तक चिंता,दुख व असफलताओं से घिर जाने पर या कोई बात ,सदमा, मृत्यु भूल नहीं पाता ,तब कुछ ऐसी मानसिक परिस्थितियों से घिर जाता है कि उसकी सोचने और विवेक की शक्ति क्षीण हो जाती है ।

प्रज्ञा- सही कहा आपने ।

विनीता -   वह व्यक्ति घोर निराशा व अंधकार से अपने आप को निकालने में असक्षम हो जाता है ।

सामाजिक बोलचाल व व्यवहार में कमी आने लगती है, उसे लोगों से मिलना जुलना अच्छा नहीं लगता। बात करना अच्छा नहीं लगता ,गुमसुम रहने लगता है ।चिड़चिड़ा रहता है, शांत रहता है ,भूख प्यास कम हो जाती है ।थकान जल्दी लगती है। किसी कार्य में मन नहीं लगता ,उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता अनेक लक्षण दिखते हैं ।

प्रज्ञा- अच्छा! उपचार के लिए क्या किया जाना चाहिए? जैसे------

विनीता -  व्यक्ति को समय रहते पहचानने की आवश्यकता है। समय पर कारणों पर ध्यान दिया जाए व उनकी पहचान कर ली जाए, तो काफी हद तक इसके इलाज उपचार की संभावनाएं बढ़ जाती हैं समय पर उपचार द्वारा व परिवार के सहानुभूति प्यार व स्नेह के साथ पीड़ित व्यक्ति की सहायता की जा सकती है उसे अवसाद से निकाला जा सकता है इसके अतिरिक्त उस व्यक्ति को अधिक से अधिक व्यस्त रखा जाए, उससे स्नेह और प्यार से अधिक बात करें!  रुचि दिखाई जानी चाहिए परिवार का और अधिक ध्यान उस पर बढ़ जाना चाहिए ।

यह एक मानसिक स्थिति है इससे उबरने में अपनों का साथ ही संबल बनता है और सही सलाह चिकित्सीय परामर्श लेने में भी संकोच नहीं करना चाहिए,  आज मानसिकता बदलने की आवश्यकता है।

प्रज्ञा-  "घंटी बज गई शोक सभा का समय हो गया चलो चलते हैं।"

सुनीति केशरवानी 'नीति'
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
94157 00459


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