*युद्ध नहीं समाधान*
धधकती धरती की साँसों में बारूद की गंध है,
आकाश भी आज जैसे रोता हुआ निर्जन छंद है।
मानवता की आँखों में फिर डर का है अंधकार
इतिहास के पन्नों पर खून का ही है विस्तार ।
दो विश्व युद्धों की राख अभी ठंडी भी ना हुई
कि फिर हवाओं में नफरत की चिनगारी है जली,
कितनी माताओं की गोद उजड़ी, कितने सपने टूटे,
कितने मासूम चेहरों पर आँसू बनकर दर्द हैं फूटे।
नदियाँ भी लाल हुईं, जंगल सिसक-सिसक कर जले,
पंछी बेघर हो गए, पर्वत भी जैसे मौन खड़े ।
धरती की हरियाली को इंसान ने खुद ही लूटा,
अपने ही अस्तित्व पर उसने क्रूर प्रहार है कूटा।
क्या जीत वही, जहाँ जीवन का हर स्वर जाए हार?
क्या शांति वही, जहाँ हर दिल में केवल अत्याचार?
कब समझेगा मानव कि युद्ध नहीं है समाधान,
यह तो बस बढ़ाता है पीड़ा और श्मशान।
आओ फिर से प्रेम के बीज हम मिलकर बोएँ,
घृणा के अंधेरों में उम्मीद के दीप संजोएँ।
क्योंकि हर बम से पहले एक दिल है टूटता,
और हर युद्ध में इंसान ही
सबसे ज्यादा है घुटता।
तपन का तांडव
धूप आज कुछ यूँ उतरी है धरती के आँचल पर,
मानो भानू के अंग स्वयं जल उठे हों प्रखर।
आकाश तपन की चादर ओढ़े, नीरव-सा हो गया,
हर एक श्वास में अंगारों का स्पर्श समा गया।
नदियाँ अपनी धारा भूल, भाप बनी उड़ती हैं,
लहरों की हर साँस तपन में धीरे-धीरे घुटती है।
समंदर भी शांत नहीं, उफनता है उबल-उबल,
जैसे भीतर आग छिपाए, करता हो कोई हलचल।
वृक्ष खड़े हैं मौन, झुलसते पत्तों की छाँव लिए,
टूट रही हरियाली जैसे स्वप्न किसी ने चुरा लिए।
कलियाँ आधी खुली रह गईं, डरती धूप के वार से,
फूलों का रंग फीका पड़ता, लू के निर्दयी प्रहार से।
पक्षी भी अब गीत नहीं, बस छाँव की तलाश में,
पंख समेटे बैठे हैं वे जीवन की आस में।
जानवर भी सूखी धरती पर थके-थके से चलते,
हर कदम पर तपती मिट्टी उनके पाँवों को छलते।
हे प्रकृति! यह कैसा क्रोध, यह कैसा तेरा रूप,
जीवन की हर रेखा जलती, हर दिशा में बस धूप।
फिर भी आशा की एक किरण मन में जगती जाती—
कभी तो बदली आएगी, और शीतल वर्षा लाएगी।
दूर क्षितिज पर धूल उठे, जैसे अग्नि का कोई नृत्य,
हवा भी लपटों-सी बहती, हर श्वास बन जाए कष्ट।
धरती माँ की प्यास बढ़ी, आँखों में सूखा विस्तार,
मेघों से बस एक विनती है
,,"ऐ दविंदर " बरसाओ जीवन की धार।
डाॅ.दविंदर होरा
साहित्यकार
इंदौर म.प्र
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