‘‘किससे पूछूं कि कहां गुम हूं कई बरसों से।
हर जगह ढूंढता फिरता है, मुझे मेरा घर।।’’
ये पंक्तियां शेरो-शायरी की किसी पुस्तक से नहीं अपितु एक ट्रक के पीछे से ली हुई हैं, जिसे मैंने सड़क पर चलते हुए पिछले दिनों पढा था। इन लफ़्जों में एक अनाम ड्राइवर ने अपनी पीड़ा को उड़ेला है। सरे राह चलते चलते एक अन्य ट्रक के पीछे थके-मांदे ड्राइवर की ये हसरत दृष्टिगोचर हुई-
‘‘राम कहो आराम मिलेगा, सुबह नहीं तो शाम मिलेगा।
खाने को पकवान मिलेगा, बैठने को विमान मिलेगा।।’’
पहियों पर दौड़ती जिंदगी के खतरों से वाकिफ पत्नी की चिंताओं, उसकी विरह वेदना को चालक पति बखूबी समझता है और इन पंक्तियों से भरोसा देता है-
‘‘अपनी पलकों पर ख्वाबों को संजोये रखना।
मैं कल आऊंगा शमां जलाए रखना।।
लेकिन जानता वो भी है कि वादे के मुताबिक पहुंच पाना उसके बस में नहीं है। कहीं ट्रेफ्कि जाम, कभी मौसम की मार, इनसे बचे तो मशीनी खराबी आड़े आ जाती है तब उसे याद आता है, पत्नी द्वारा दिया गया उलाहना- ‘चल झूठे’। यही उलाहना इस दफा फिर दोहराया जाएगा। वादा खिलाफी पर रूठी बेगम को एक ट्रक चालक इस तर्क से तसल्ली देता है-
‘‘जानम समझा करो बात को, चलते हैं हम रात को।’’
सड़क पर दौड़ता साहित्य हमें ये भी बताता है कि महत्वकांक्षाएं इंसान की बपौती नहीं होती बल्कि बेजान वस्तुएं भी उसे पाल सकती हैं। एक मिनी ट्रक के पीछे लिखा वाक्य- ‘‘मैं ट्रक कब बनूंगी?’’
लिहाजा, मैंने बसों, ट्रकों, ट्रोलाओं, डम्परों, टेम्पो, ऑटो रिक्शाओं के पीछे लिखीं उक्तियों तथा शेर-ओ-शायरी का संग्रहण आरंभ किया और उनके विश्लेषण से पाया कि वे वाहन चालकों-परिचालकों की पीड़ाओं, मनोभावों, विवशताओं के साथ ही धर्म, दर्शन, संस्कृति, नीतिक्ति, चुनौती, नश्वरता, नसीहत, हास्य-व्यंग्य, रोमांच, रोमांस आदि के प्रति उनकी सकारात्मक सोच को भी उजागर करती प्रतीत होती हैं-
‘‘उजाला अपनी यादों का हमारे साथ सफर में रहने दो।
न जाने जिंदगी के किस मोड़ पर कब शाम हो जाए?’’
‘‘किस्मत ही ऐसी पायी है, हर वक्त सफ़र में रहते हैं।
ड्राइवर की जिंदगी से रिश्ते-नाते दूर रहते हैं।।’’
‘‘ये ही बीवी, ये ही बच्चा, ये ही घर-द्वार मेरा।
इसी से मोहब्बत है, ये ही रोजगार मेरा।।’’
‘‘आना तेरा मुबारक तशरीफ लाने वाले।
गड्डी चला रहे हैं, गड्डी चलाने वाले।।’’
‘‘मैं हवा का हमसफर, मंजिल कहां मेरी मगर।
तुम(यात्री) जहां आवाज दोगे, ठहर जाऊंगा मैं वहीं पर।।’’
‘‘हजारों मंजिलें होंगी, हजारों कारवां होंगे।
सवारियां हमें ढूंढेंगी, हम न जाने कहां होंगे।।’’
‘‘सजी है दुल्हन बराती कोई नहीं।
सफर लम्बा है साथी कोई नहीं।।’’
‘‘डुबा दे या तिरा दे अब तेरी मरजी।
उठा के लंगर छोड़ दिया अब तेरे हवाले।।’’
‘‘फानूस बनके जिसकी हिफाजत हवा करे।
वो शमां क्या बुझे जिसकी हिफाजत खुदा करे।।’’
‘‘तेरी नज़रो करम हो ये दुआ करते हैं, हम।
आज तेरा नाम लेके ये इब्तिदा करते हैं, हम।।’’
‘‘मैं खूबसूरत हूं, इतनी नज़र न लगाना।
जिंदगी भर साथ दूंगी, पी के न चलाना।’’
‘‘जितना चाहे भगा ले, मंजिल पे पहुंचा दूंगी।
अगर निगाह चूकी तो धूल में मिला दूंगी।।
‘‘मैकेनिक की जिंदगी बिस्कुट और केक पर।
ड्राइवर की जिंदगी स्टियरिंग और ब्रेक पर।।’’
‘‘हम अपनी गाड़ी को यूं ही चलाते रहेंगे।
जलनेवालों को हम यूं ही जलाते रहेंगे।।’’
‘‘या खुदा मेरे दुश्मन को सलामत रखना।
वरना मेरे मरने की दुआ कौन करेगा?’’
‘‘इरादे लाख करो, टूट जाते हैं।
अजमेर वही जाते जिन्हें ख्वाजा बुलाते हैं।।’’
‘‘तेल में न हो कचरा गाड़ी रूक नहीं सकती।
चमचों से मिलकर रहो, नौकरी छूट नहीं सकती।।’’
‘‘चलती है ट्राली, उड़ती है धूल।
जलते हैं लोग, खिलते हैं फूल।।’’
‘‘तलवार है, पुरानी मगर धार वही है।
गाड़ी है पुरानी मगर रफ्तार वही है।।’’
‘‘धन दिया, दौलत दिया गाड़ी बनाने वाले को।
घर से बेघर कर दिया गाड़ी चलाने वाले को।।’’
‘‘दूसरों का माल देखकर हैरान न हो।
खुदा तुझे भी देगा परेशान न हो।।’’
विषयों की गंभीरता के अतिरिक्त बहुत सी हल्की-फुल्की फूलझड़ियां भी होती हैं, जो आमजन का मनोरंजन करती हैं, उनमें से चुनिंदा पेश है जो मर्यादा की सीमा रेखा पर ही हैं-
‘‘चलती है टाटा उड़ती है धूल।
चमेली के बालों में गुलाब का फूल।।’’
‘‘पतली कमर है, तिरछी नज़र है।
तिरछी नज़र वाली तेरा ध्यान किधर है?’’
‘‘नहीं सुख पाते औरों को सताने वाले।
खुद जला करते हैं औरों को जलाने वाले।।’’
‘‘चांद पर चकोर और बादल लच्छे लच्छे।
एक तू नहीं, मुझ पर मरते हैं अच्छे अच्छे।।’’
एक चालक का अपनी निर्दोष सोच को इस प्रकार व्यक्त करता है-
‘‘छुपा दो उन हसीनों को जो खुद ये काम करती हैं।
गिरा के जुल्फ गालों पे ड्राइवर को बदनाम करती हैं।।’’
‘‘ड्राइवर की जिंदगी में लाखों इलजाम होते हैं।
निगाहें साफ होती हैं फिर भी बदनाम होते है।।’’
कुछ उक्तियां-
‘‘हिम्मत है तो पार कर वरना बर्दास्त कर।’’
‘‘हम चलते, तुम क्यों जलते।’’
‘‘ए औलाद वाले तेरे बच्चे जिएं और बड़े होकर तेरा खून पिएं।’’
‘‘आओ तो वेलकम, जाओ तो भीड़ कम।।’’
‘‘ 100 में से 99 बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान।’’
‘‘13 मेरा 7’’
‘‘1 बार मुस्करा 2’’
सरकारी सार्वजनिक परिवहन के चालक-परिचालक वाहनों पर अपनी पसंदीदा देशनाएं नहीं लिखवा सकते क्योंकि वो सरकारी सम्पति है। सरकारी परिवहन हेतु प्रयुक्त वाहनों के बाह्य आवरणों पर प्रायः सरकारी योजनाओं के विज्ञापन प्रचारित किए जाते हैं। मुझे याद है, पिछली सदी के अस्सी के दशक में परिवार नियोजन और एड्स के संक्रमण के प्रति नागरिकों को सजग करने के लिए निरोध का व्यापक प्रचार इसी माध्यम से किया गया था। किंतु निजी लोक परिवहन के वाहनों में ये बाध्यता नहीं है। उनमें बाह्य और भीतरी आवरण पर भांति भांति के सुशोभित वाक्य और शायरी दृष्टिगत होती है। गांवों और कस्बों की ओर आने-जाने वाली बसों में एक दृश्य और दिखेगा। उन वाहनों में अंदर घुसते ही पहली नज़र विंड स्क्रीन के ऊपरी हिस्से पर पड़ती है, वहां एक सदाबहार वाक्य लिखा मिलता है- ‘‘ईश्वर आपकी यात्रा मंगलमय करे।’’
स्क्रीन के नीचे जो जगह होती है, वहां का एक शिवलिंग, पर्वत खंड उठाए हनुमान, सिंह पर विराजी दुर्गा आदि की मूर्तियां, गुरूनानक देव, मदीने वाले या ख्वाजा शरीफ की दरगाह आदि की फ्रेमयुक्त तस्वीर के चित्र और उन पर ताजा फूलों की माला के दीदार होते हैं तथा नीचे सुलगती अगरबत्ती की तेज गंध यात्रियों के नथुनों में प्रविष्ट होती रहती है। बसों की दोनों बाजू वाली दीवारों पर खिड़कियों का ऊपरी भाग शेरों-शायरी और सूक्तियों से भरा होता है। प्रवेश द्वार के ऊपर यदा कदा एक पेंटिग(जिसे किसी आशिकाना पेंटर ने अपनी मनमर्जी से बनाया होता है) पर दृष्टि पड़ती है- ‘चोंच मिलाये तोता-मैना और उनके मध्य लाल रंग से बनी दिल की आकृति।’ इस रोमांचक नज़ारे के ठीक उलट है कि वाहन के पीछे लिखा यह वाक्य- ‘‘बुरी नज़र वाले तेरा मुंह काला। मैं तेरा जीजा और तू मेरा साला।’’और उस पर तुर्रा ये कि पीछे वाले दोनों पहियों के ऊपर लटक रहे हैं दो पुराने चमरौधी जूते। मानो चेता रहे हों- शुद्ध नज़र के साथ पधारिए, सदैव स्वागत!
-प्रभाशंकर उपाध्याय
193, महाराणा प्रताप कॉलोनी
सवाईमाधोपुर (राज.)
मो. 9414045857, 8178295268
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