कार्यक्रम--कहो कहानी
उस दिन पहाड़ों पर सुबह कुछ अलग ही थी। धुंध इतनी घनी थी कि सामने खड़ा पेड़ भी धुंधला दिखाई दे रहा था। गाँव के लोग इसे सामान्य मौसम समझ रहे थे, लेकिन वृद्ध पुजारी की आँखों में एक अनजाना भय था।
उन्होंने धीरे से कहा, "आज सूर्यास्त से पहले कोई भी शिवधारा वाले जंगल की ओर मत जाना।"
लोग मुस्कुरा दिए। ऐसी चेतावनियाँ तो वे वर्षों से सुनते आए थे। लेकिन आरव, जो शहर से अपने पुश्तैनी घर आया था, इन बातों पर विश्वास नहीं करता था। उसके लिए यह सब अंधविश्वास था। दोपहर होते-होते वह कैमरा लेकर उसी जंगल की ओर निकल पड़ा।
जंगल में प्रवेश करते ही अजीब-सी शांति छा गई। पक्षियों की आवाज़ तक गायब थी। चलते-चलते उसे एक पुराना, टूटा हुआ मंदिर दिखाई दिया। मंदिर के भीतर एक दीपक जल रहा था, जबकि वहाँ कोई नहीं था। आरव ने कैमरा उठाकर तस्वीर लेनी चाही, पर कैमरा अचानक बंद हो गया। उसी समय पीछे से किसी के कदमों की आहट आई।वह तेजी से मुड़ा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। अब उसके दिल की धड़कन तेज हो चुकी थी। कुछ दूर उसे एक वृद्ध साधु दिखाई दिए। उन्होंने बिना उसकी ओर देखे कहा,
"जिसे खोजने आए हो, उसे देखकर लौट नहीं पाओगे।" आरव घबरा गया। उसने पूछा, "आप कौन हैं?"
साधु मुस्कुराए, लेकिन उत्तर नहीं दिया।
अचानक तेज़ हवा चली और मंदिर की घंटी अपने-आप बजने लगी। आरव ने दोबारा पीछे देखा तो साधु गायब थे। अब उसे पहली बार लगा कि गाँव वालों की बात शायद सच थी। वह जल्दी-जल्दी वापस लौटने लगा, तभी उसकी नज़र एक पुराने पत्थर पर पड़ी। उस पर उकेरा था— "उस दिन जो यहाँ आया, वह कभी पहले जैसा नहीं लौटा।" आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
अचानक उसके मोबाइल पर नेटवर्क आ गया और एक अनजान नंबर से संदेश आया— "पीछे मत देखना।"
उसने संदेश पढ़ा और तेज़ कदमों से चलने लगा।
लेकिन इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी जिज्ञासा होती है। कुछ ही क्षण बाद उसने पीछे मुड़कर देख लिया। धुंध के बीच सफेद वस्त्र पहने एक आकृति बिल्कुल स्थिर खड़ी थी। उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था, पर ऐसा लग रहा था कि वह सीधे आरव को ही देख रही है। आरव भय से दौड़ पड़ा। जैसे-तैसे गाँव पहुँचा तो साँसें उखड़ चुकी थीं।
गाँव वालों ने बताया कि वर्षों पहले उसी दिन एक यात्री रहस्यमय ढंग से गायब हो गया था। तब से हर वर्ष उसी तिथि पर जंगल किसी न किसी को अपनी ओर खींच लेता है। आरव ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला ताकि वह सबको वह रहस्यमय संदेश दिखा सके। लेकिन मोबाइल में कोई संदेश नहीं था। कैमरे की मेमोरी भी पूरी तरह खाली थी। मानो जो कुछ उसने देखा था, उसका कोई प्रमाण कभी था ही नहीं। आज कई वर्ष बीत चुके हैं। आरव उस घटना का ज़िक्र बहुत कम करता है।
लेकिन हर साल उसी तारीख़ को उसके मोबाइल पर बिना किसी नंबर के केवल दो शब्द दिखाई देते हैं—
"फिर मिलेंगे..."
और उसी क्षण उसके कमरे में कहीं दूर से मंदिर की घंटी की आवाज़ सुनाई देने लगती है।
उस दिन वास्तव में क्या हुआ था, यह रहस्य आज भी अनसुलझा है।
— डॉ. आरती वाजपेयी
स्थान – लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मोबाइल – 9919335333
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