शहर के चौराहे पर लगा नेताजी का स्टैचू आज भी वैसा ही है। उनका हाथ हवा में ऐसे ठहरा है, मानो किसी अदृश्य भीड़ को बरसों से समझा रहे हों, " मैंने तुम्हें विकास का जो लॉलीपॉप दिया है, उसे चूसना क्यों छोड़ रहे हो?, लॉली पाप चूसते रहो,और मुंह बंद रखो"। उसी मूर्ति के चौराहे के कोने में मोची रामसहाय बैठा करता है । उसे बहुतों की टूटी चप्पलें मौके पर सिलनी होती हैं और इंटरव्यू देने जाते बेरोजगार लोगों के जूते चमकाने होते हैं।आज उसके पास सिर उठाने की फुर्सत नहीं है। उसे उन 'खास' जूतों की पॉलिश करनी है, जो कल स्वतंत्रता दिवस की परेड में 'आम' सड़कों पर शान से धूल उड़ाते हुए चलेंगे।
राम सहाय को उसके बचपन की याद है। गर्मियों की दोपहरी में खास लोगों के बंगलो की खिड़कियों और दरवाजों पर खस की खुशबूदार चिक लगाई जाती थी। वह खास लोगों को आम लोगों से अलग करने वाली एक अदृश्य, मगर ठंडी विभाजक रेखा थी । बाहर का 'आम' आदमी भरी दोपहरी में बाल्टी भर-भरकर पानी उस चिक पर छिड़कता था।भीतर 'खास' साहब मखमली कुर्सी पर पसरकर उस ठंडी बयार में कलमी आम को तक चूसकर आनंद लेते थे । बाहर सिंचाई करता 'आम' आदमी भी खस की महक को ही अपनी नियति मानकर तृप्त हो जाता था। खस की महक की खुशी 'आम' के पसीने और 'खास' के आराम के बीच का इकलौता साझा रिश्ता थी। आज न खस की चिक बची, न वह सादगी। शीशे की वातानुकूलित दीवारों ने खस को रिप्लेस कर दिया है। इस कांच की दीवार ने संवेदनाओं को भी 'फ्रीज' कर दिया है। अब कोई किसी की खिड़की पर पानी नहीं छिड़कता, क्योंकि अब भीतर वालों को बाहर की गर्मी का एहसास ही नहीं होता।पहले अंदर की खास लोगों की बातें खस की चिक के उस पार आम व्यक्ति तक पहुंच जाती थी। अब कांच के पार आवाजें नहीं जाती ।
रामसहाय ने अब मेरी घिसी हुई टूटी चप्पल सिलना शुरू किया था ।मैंने उस से पूछा, "रामू भाई, खस की चिक हट गई, अब क्या बचा?" उसने बिना नज़र उठाए जवाब दिया, "साहब, अब चिक नहीं, एल्गोरिदम की दीवार है। पहले हम पानी छिड़कते थे तो महक हमें भी नसीब होती थी। अब हम सिर्फ डेटा रिचार्ज करवाते हैं, ताकि 'खास' लोगों की डिजिटल चमक को लाइक कर सकें।" कहने को सच है कि खास वह नहीं है जो बंगलों में बैठा है। खास तो वह है, जो यह तय करता है कि किस 'आम' को कितनी देर तक किस मुद्दे की हवा में भिगोकर खास बनाए रखना है। और रामसहाय इस तरह का ही खास आम है।वह निचोड़ा जाता है, बार बार नए तरीकों से नए लोगों द्वारा ।
चौराहे पर पकौड़े तलने वाले की कड़ाही में तेल तो एक ही खौल रहा है, पर 'पकौड़े' की गुणवत्ता पर राजनीति की मोहर लगी है। 'खास' काउंटर पर पकौड़े सजे-सजाए प्लेट में पहुंचते हैं। 'आम' काउंटर पर आदमी को अपनी थाली खुद ही ढोनी पड़ती है । यह 'सेल्फ-सर्विस' का दौर है। 'आम' आदमी का लाइन में खड़े होना लोकतंत्र की गरिमा है, और 'खास' का सीधे अंदर जाना वीआईपी शिष्टाचार है। अगर 'आम' आदमी कुर्सी मांग ले, तो वह 'अतिक्रमणकारी' करार दिया जाता है, जबकि 'खास' का वहां बैठना 'जन-संवाद' की तस्वीर बन जाता है। खस की चिक के साथ हमने वह सौंधी खुशबू खो दी है, जो वर्ग-भेद को कम से कम 'महसूस' तो करने देती थी। आज की एयर-कंडीशंड खामोशी में संवाद मर चुका है। 'आम' आदमी 'खास' बनने की ऐसी अंधी दौड़ में है कि वह यह भूल गया है कि वह खुद उस पेड़ का तना है, जिस पर 'खास' फल लटके हैं।
त्रासदी यह है कि 'आम' आदमी ने अब यह मान लिया है कि उसे कुल्हड़ ही नसीब होगा और 'खास' को चीनी मिट्टी का प्याला। मिट्टी तो मिट्टी ही है, चाहे वह कप हो या कुल्हड़। मेरी टूटी चप्पल सिल कर फिर एट माई सर्विस , ऑन रोड आ चुकी थी। मैं फटियाते हुए आगे निकला,सोच रहा था कि जिस दिन 'आम' आदमी शीशे की दीवार हटाकर भीतर की बातों में हिस्सेदारी का साहस करेगा, उस दिन शायद सारी कृत्रिम व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी। तब तक, बस लॉली पाप चूसते हुए , मुंह बंद रख मुस्कुराते रहिए। हंसी अभी भी टैक्स-फ्री है। पर डर तो यह है कि कहीं अगली बजट मीटिंग में 'हंसी कर' न लग जाए। आखिर, 'खास' को अपनी लग्जरी गाड़ियों के लिए पेट्रोल और खामोशी के लिए साउंड-प्रूफ दीवारों का खर्चा तो 'आम' के पसीने से ही निकालना है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
70003 75798

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