लेखिका: ऊषा सक्सेना, वरिष्ठ साहित्यकार, भोपाल_
आज देश का हर दूसरा घर एक ही सवाल से जूझ रहा है — आखिर स्कूलों के होते हुए भी कोचिंग सेंटरों की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्यों माता-पिता अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा कोचिंग की फीस में झोंकने को मजबूर हैं? क्यों हमारे युवा,जो देश का भविष्य हैं।आज कोचिंग की चारदीवारी में कैद होकर रह गए हैं?
*एक देश, एक पाठ्यक्रम की अनिवार्यता*
समस्या की जड़ हमारी खंडित शिक्षा नीति है। CBSE, ICSE, राज्य बोर्ड — सबके कोर्स अलग, स्तर अलग। लेकिन NEET, JEE, UPSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाएं एक ही होती हैं। नतीजा? स्कूल में पढ़ाया कुछ और जाता है, परीक्षा में पूछा कुछ और जाता है। इस खाई को पाटने का काम कोचिंग सेंटर कर रहे हैं।
समाधान स्पष्ट है: पूरे देश में NCERT द्वारा निर्धारित एक समान पाठ्यक्रम लागू हो। जब हर बच्चे को एक जैसी किताब, एक जैसा ज्ञान मिलेगा, तभी समान अवसर की बात सार्थक होगी।
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति- NEP-2020 में 'एक राष्ट्र, एक पाठ्यक्रम' की बात कही गई है,पर जमीनी स्तर पर इसे सख्ती से लागू करना बाकी है।
इसका मुख्य कारण केन्द्र -राज्य के मध्य टकराव /संघीय ढांचा होने के कारण शिक्षा समवर्ती सूची का विषय होने से इसे राज्यों के अधिकारों को समाप्त करनै की बात कहकर नकार दिया गया । दूसरा कारण शिक्षकों का प्रशिक्षण का गैप रहा हमारे पास उसके लिये प्रशिक्षित शिक्षक नही थे ।
इसके अतिरिक्त भाषा और पाठ्यक्रम पर विवाद रहे तमिलनाडु ने त्रिभाषा फार्मूला का विरोध किया ।
इसीलिये शिक्षा का निजीकरण
हुआ और छात्रों के लिये शिक्षा महंगी । मुख्य बात शिक्षा की नीति बदली परंतु परीक्षा के सिस्टम में बदलाव नही हुआ
इन सब समस्याओं का समाधान होना चाहिये था जो नही हुआ । परिणाम हमारे सामने हैं ।
आज यदि हमें अपने देश के युवाओं को बचाना है तो सबसे पहले उनके लिये स्वस्थ और स्वच्छ वातावरण का निर्माण आवश्यक है । शिक्षा प्रयोग की वस्तु नहीं जिसे बार-बार बदला जाये । विद्यालय तो ज्ञान के अकूत भंडार है ।आवश्यकता उस पर पुन: विचार की ।किस प्रकार से हम देश के युवावर्ग आत्म हत्या करने और कोचिंग सेंटरों में जाने से रोकें ।
कोचिंग सेंटर व्यापार है और उसे चलाने वाली व्य्वसायी हैं क जो विशेष विषय के विशेषज्ञों को वेतन पर रखकर उनसे कार्य करवाते हैं जितने अधिक छात्र होंगे उतनी ही अधिक कमाई।
इस विषय में वहभूल जाते हैं
*शिक्षक-छात्र अनुपात ही गुणवत्ता की कुंजी है*:-
यदि एक शिक्षक को केवल 15 विद्यार्थियों की कक्षा दी जाए, तो शिक्षा का पूरा परिदृश्य बदल जाएगा। शिक्षक हर छात्र की कमजोरी-ताकत पहचान पाएगा। वह 'सिलेबस पूरा कराने वाली मशीन' न बनकर 'गुरु' की भूमिका में आएगा। जब शिक्षक को पता होगा कि मेरे पढ़ाए गए प्रश्न ही प्रतियोगी परीक्षा में आएंगे,तो उसे वह पूरे मनोयोग से पढ़ाएगा। ऐसे में छात्र को कोचिंग जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
शिक्षक का समाज में सम्मान भी लौटेगा,जो आज कोचिंग के 'ब्रांडेड टीचर' के आगे फीका पड़ गया है।
*कोचिंग सेंटर: मजबूरी या मुनाफाखोरी?*
प्रश्न उठता है कि कोचिंग सेंटर फल-फूल क्यों रहे हैं? क्योंकि हमने सिस्टम में एक लूपहोल छोड़ दिया है। प्रतियोगी परीक्षाओं में सिलेबस से बाहर के,घुमावदार प्रश्न पूछकर बच्चों को डराया जाता है। माता-पिता डर के मारे कोचिंग की ही शरण लेते हैं।
दूसरी ओर यह नही देखा जाताकि यह , कोचिंग सेंटर कहां चल रहे । कहीं भी किसी भी बेसमेंट में,बिना फायर सेफ्टी, बिना निकास द्वार के चल रहे हैं।
इसमें यदि हम इन हिदसों की सूची देखें तो एक लम्बी फेहरिस्त सामने होगी ।
दिल्ली के राजेंद्र नगर का हादसा, कोटा में छात्रों की आत्महत्याएं —ये सब उसी लूपहोल का नतीजा हैं। हम अपने ही हाथों अपने भविष्य की बलि दे रहे हैं। जिस युवा को देश की शक्ति बनना था, वह कोचिंग के दबाव की भेंट चढ़ रहा ।
*समाधान के लिये आवश्यक*
1.*परीक्षा प्रणाली में सुधार*: प्रतियोगी परीक्षाओं के 100% प्रश्न निर्धारित NCERTके निर्धारित सिलेबस से ही आएं। सिलेबस से बाहर का एक भी प्रश्न न हो।
2.*स्कूलों का सशक्तिकरण*: स्कूलों में प्रयोगशाला, लाइब्रेरी, योग्य शिक्षक सुनिश्चित किए जाएं। शिक्षकों की भर्ती में पारदर्शिता हो ताकि विषय विशेषज्ञ युवाओं को रोजगार मिले।
3.*कोचिंग पर नियमन*: कोचिंग सेंटरों के लिए सख्त लाइसेंस, सुरक्षा मानक, फीस नियंत्रण अनिवार्य हो। अवैध सेंटर तुरंत बंद हों।
4 *मानसिक स्वास्थ्य*:-
छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य परीक्षण भी आवश्यक है।हर छात्र की विषय को ग्रहण करने की क्षमता समान नही होती
हर स्कूल में काउंसलर हो'कोटा फैक्ट्री' कल्चर को खत्म करना होगा। यदि देश में एक समान, मजबूत *राष्ट्रीय शिक्षा नीति* लागू होती है तो इसका दोहरा लाभ होगा। पहला, कोचिंग का आर्थिक बोझ खत्म होगा। दूसरा, लाखों पढ़े-लिखे युवाओं के लिए स्कूलों में शिक्षक बनने के द्वार खुलेंगे, बेरोजगारी घटेगी। देश खुशहाल होगा ।देश की युवा शक्ति का लाभ समाज और देश को मिलेगा जिससे विकास की गति तेज होगी । हमारे युवाओं कै नौकरी की तलाश मे बाहर विदेशों में नही जाना होगा ।
समय परिवर्तनशील है। शिक्षा नीति में भी परिवर्तन आवश्यक है ।यह लूपहोल सिस्टम अब और नहीं चल सकता। यदि हमने समय की पुकार नहीं सुनी, तो समय हमें बदल देगा — और वह बदलाव शायद बहुत महंगा पड़े। देश की युवा
शक्ति को इधर-उधर भटकाने से रोकना है तो शिक्षा को ही हमें आधार, समाधान और शक्ति बनाना होगा। तभी देश का नैतिक चरित्र ऊंचा उठेगा और हमारा देश विश्वगुरु बनेंगा।
ऊषा सक्सेना-
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