बुधवार -गुरूवार
वो न दौलत, मोहब्बत, इबादत किसी में है
तू खुश रहे, खुशी मेरी इसी में है
तू हँसती रहे, तू मुस्कुराती रहे
मै कहीं भी रहूँ, तू कहीं भी रहे।
ग़म के साये तो समंदर-से हैं
हाल-ए-हसरत मुरझाये मंजर-से हैं
मगर, सितारों-सी चमकती हैं यादें तेरी
और आती आवाज दिल के अंदर से है--
सलामत रहे, तू सलामत रहे
मै कहीं भी रहूँ, तू कहीं भी रहे।
रात चाँदनी में हम मिले थे कभी
फूल खुशियों के खिले थे कभी
मेरी बाँहों के घेरे में आते हुए
कहा था तुमने ये लजाते हुए
रिश्ता रूह का है, ना टूटेगा कभी
फरिश्ता यकीं का ये, ना रुठेगा कभी
और फिर जब तुम जाने लगी
भींगी पलकों को समझाने लगी
हम मिलेंगे, मिलेंगे तुम कहती रही
एक धारा थी जो आँखों से बहती रही
रुख़सत हुई तुम एक आस देकर
बरसों बिताए मैंने गहरी सांस लेकर
मगर लौट के फिर तुम नहीं आई
काँटों-सी चुभती रही तेरी जुदाई
ख्वाबों की एक कतरन मेरी आंखों में है
महक मुलाक़ातों की अब भी साँसों में है
आवारगी अश्कों की कह रही है यही
है इश्क़ ज़िंदा मगर सलाखों में है
सात तालों में है, मेरी ख्यालों में है
मै कहीं भी रहूँ, तू कहीं भी रहे।
----दिनेश कुमार राय
पटना
मो: 9771294806
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