ये घटना 2003 की है। जब मैं अपने मामा जी के निधन पर सागर जिले की तहसील रहली जा रही थी। हमारे पति महोदय टूर पर गए थे। बड़ी दीदी, मैं और मेरी बीच वाली दीदी ,हम तीनों बहनें ट्रेन से सागर पहुंचे। रेलवे स्टेशन पर जल्दी से उतरकर हम लोगों ने अपना सामान उठाया ,और जल्दी से रिक्शा लेकर हम लोग रहली जाने के लिए बस स्टैंड पर पहुंचे। उन दिनो रहली के लिए ,बहुत कम बसे चलती थी। हम लोगों को भी पहुंचने की जल्दी थी। हम लोगों ने देखा रहली की बस , जाने के लिए तैयार खड़ी थी। सभी यात्री उसमें बैठ रहे थे। मैं और मेरी दोनों बड़ी बहने भी जल्दी से अपना-अपना सामान उठा के उसमें बैठ गई। हमने ऑटो वाले को पैसे दिए। ऑटो वाला हमें छोड़कर चला गया। हम सब अपना-अपना सामान सीट के नीचे और ऊपर जमा रहे थे। तभी हमारी बड़ी दीदी जिनका नाम पुष्प लता था, बोली मेरा छोटा बैग कहां है? लाओ उसको हम अपने हाथ में ही पकड़कर रखेंगे। हम लोगों ने यहां वहां देखा। बैग कहीं नहीं था। बस छूटने वाली थी। दीदी का पर्स, सोने की ज्वेलरी सब उसी बैग में थी। बस भीआखिरी थी। हम बस से उतर भी नहीं सकते थे। ऑटो का नंबर भी हमें नहीं मालूम था। सागर में कहीं हमारे रुकने की व्यवस्था भी नहीं थी। अब हम बहनों के चेहरे पर घबराहट साफ नजर आ रही थी। हम कुछ भी करने की स्थिती में नही थे ,बस आगे बढ़ने लगी। इतने में हमने देखा ऑटो वाला हाथ दे के जोर-जोर से बस को रुकने-रुकने की आवाज दे रहा था। बस वाले ने बस धीमी की, आटो चालक आया। उसने हमें अपना बैग पकड़ाया, और बोला बाई साहब देख लो आपका सामान तो पूरा है कि नहीं?
हमने बैग पकड़ा, दीदी उसे कुछ देना चाह रही थी। उसने हाथ जोड़ते हुए ,सिर हिलाया और आगे बढ़ गया। उस घटना को गुजरे हुए काफी समय हो गया। परंतु उसकी ईमानदारी आज भी हम लोगों को मौके -वेमौके याद आती है। ऐसा लगता है जैसे कि कल की ही बात हो ,सच में कुछ लोग ईमानदारी की जीती,जागती मिसाल होते है,
लेखिका-आशालता दुबे
+91 81096 66346
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