मेरी पत्नी *स्मिता* के नाम एक कविता


घर की लक्ष्मी बनकर आई थी स्मिता,  

अब मेरे बच्चे की दुनिया बन गई है।  

सुरेन्द्र की हमसफ़र बनकर आयी थी,  

आज मेरे बच्चे की जन्नत बन गई है।


सुबह उठकर टिफिन बनाती है,  

रात में सबको खिलाकर खुद खाती है।  


अपने सपनों को भूलकर स्मिता,  

अपने बच्चे का सपने सजाती है।


बाहर से थककर जब मैं आता हूँ,  

चाय का प्याला थमाती है। 

 

बच्चा गिर जाए तो दौड़कर,  

पहले गले लगाती है।


एक औरत में कितने रूप हैं,  

पत्नी, बहू और अब माँ।  

स्मिता नाम की इस देवी को,  

शत-शत नमन करता हूं और कहता हूं,

तुम धन्य हो जो मेरे जीवन में आयी और मेरे जीवन में बहार लायी।


 सुरेन्द्र सिंह 

(9748837443)

हावड़ा, पश्चिम बंगाल



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