वृद्ध-विवाह : हास्यास्पद या ज़रूरत - शैली


भारतीय संस्कृति के लिए विवादास्पद परन्तु एक बड़े वृद्ध समुदाय के लिए 'प्रश्न चिह्नके से अधिक 'टैबू' (निषेध) के बारे में, अग्रिम क्षमा प्रार्थना के साथ, लिख रही हूँ। जिसे प्रथम दृष्टया, यही सीनियर सिटीज़ या प्रबुद्ध वर्ग नकार देंगे। लेकिन यदि आप खुले विचारों के, तार्किक व्यक्ति की तरह पढ़ेंगे तो शायद इस बात की सच्चाई से पूर्णतः नहीं तो निश्चित रूप से, अंशतः सहमत होंगे।मैं एक माध्यम वर्ग की सामान्य स्त्री हूँ। लेकिन यह लेख लिंग, जाति, धर्म, उम्र, संप्रदाय और धार्मिक बेड़ियों से मुक्त एक स्वतंत्र व्यक्ति और विचारक की तरह लिख रही हूं। इतनी भूमिका इस लिये क्योंकि मुझे विश्वास है कि, मुझे कटु से कटुतम आलोचना झेलनी होगी…लेकिन किसी को तो परिधियाँ लांघनी होंगी, नींव का पत्थर बनना होगा। मैं यह जोखिम उठा रही हूँ और आशा करती हूँ आप सहृदय पाठक भी मेरे जोखिम में भागीदार बनेंगे।


कुछ दिन पूर्व वैवाहिक(मेट्रीमोनियल) में किसी प्रगतिशील, सत्य को स्वीकारने वाले वरिष्ठ नागरिक का विज्ञापन देखा था, जो पत्नी की तलाश में था (सामान्य जनता के लिए वह हास्यास्पद या लज्जासपद होगा)। 

आज एक फेस बुक पोस्ट पढ़ी, आपके समक्ष प्रस्तुत है - 


“आवश्यकता है-

एक पढ़े-लिखे, समझदार इकहत्तर वर्षीय बूढ़े किसान को पढ़ी-लिखी, समझदार 50-60 के बीच की बुढ़िया चाहिए। बहुत पसंद आ जाने पर उमर में ढील दी जायेगी। शर्त एक ही है कि वासना रहित प्यार की लेन-देन में सक्षम हो। प्यार, पुस्तक और यात्रा में दिलचस्पी हो। पर निंदा से दूर रहे। जब भी किसी की चर्चा करे तो उसके गुणों की हो। सादा और स्वादिष्ट भोजन बनाने में निपुण हो। पुरुषों से सहयोग लेने की कला में पटु हो। ध्यान में दिलचस्पी हो तो कहना ही क्या! हँसमुख हो। निरर्थक बातें न करती हो। धन-लोभी न हो। सज्जनों के प्रति प्रेम और दुर्जनों के प्रति क्रोध से भरी हो। बूढ़े ने बुढ़िया से इतने गुणों की अपेक्षा इसलिए की है, क्योंकि ये गुण उसमें भी विद्यमान हैं।” इस पर दी गई प्रतिक्रियाएं भी पढ़ीं। लगा ये विषय मात्र मनोरंजन केलिए हो। कोई भी इसे गम्भीरता से सोचते हुए दिखाई नहीं दिया।


मैं आश्चार्यचकित थी। यहाँ यह बताना चाहूंगी कि मैं “अबला जीवन हाय…”, जैसी स्त्री नहीं हूँ, ना ख़ालिस पूजा धर्म व्रत में संलग्न रूढ़िवादी, ना किसी ए, बी, सी रॉय की तर्ज वाली वामपंथी न फेमिनिस्ट होने का दंभ भरने वाली झांसी की रानी नुमा… मैं एक सामान्य सा व्यक्ति हूँ, अपने विचार, अपने दृष्टिकोण को सामाजिक करने में भयभीत नहीं हूँ।कृषिप्रधान देश भारत में कुछ दशाब्दियों पूर्व संयुक्त परिवार होते थे। खेत क्योंकि एक स्थान पर होते थे, वही आजीविका के साधन थे; तो पीढ़ी दर पीढ़ी सभी इसी पर निर्भर रहते थे। आर्थिक स्थिति सामान्यतः दृढ़ नहीं होती थी। कई पीढ़ियाँ साथ-साथ एक घर में रहती थीं। स्त्रियों की औसत आयु, पुरुषों की अपेक्षा कम थी। लेकिन विधुर वृद्ध या विधवा स्त्रियों को पारिवारिक ढांचे के कारण बहुत अधिक एकाकी जीवन, नहीं जीना पड़ता था।


समय बदला, खेती के अतिरिक्त आय के साधन बने। नौकरी पेशा समुदाय बना। स्थानांतरण एक आवश्यक नियम था नौकरी का। परिवारों का संयुक्त ढाँचा बदलने लगा। शिक्षा, व्यवसाय और नौकरी के कारण एकल परिवार अस्तित्व में आए। अब घर के वृद्ध या वृद्धाएं (विधुर या विधवा) का एकाकी जीवन बढ़ा, तिरस्कार भी। उन्हें परिवार पर बोझ माना जाने लगा। छोटे घर, सीमित संसाधन, अगली पीढ़ी की चिंता करें या मृत्यु मुख पर बैठे बुजुर्गों की?


आय क्योंकि पर्याप्त नहीं थी, वृद्ध स्त्री-पुरुष आर्थिक रूप से परिवार और बच्चों पर निर्भर थे। जो भाग्यशाली थे उन्हें बच्चों की देखरेख मिली अन्यथा बूढों की स्थिति बिगड़ी। कुछ वृद्ध असहाय से सड़कों पर फेंक दिए जाते थे, महिलाओं को सरकारी खर्च पर चलने वाले वृद्धाश्रम में या माथुर-काशी के घाटों पर भटकने के लिए छोड़ दिया जाता था।


वृद्ध होने की परिभाषा थी- जीवन के प्रत्येक सुख, सुविधा, स्वाद और इच्छाओं से विहीन हो जाना। अत्यधिक सहिष्णु, किसी बात पर क्रोधित या अपमानित ना होना। जो मिल जाय उसी में सन्तुष्ट रहना। ना कपड़ों की चिन्ता, ना भोजन और स्वाद की, ना कोई शौक ना ही सुख आराम, मनोरंजन  तो सोच के बाहर का परिंदा था…। वृद्ध जीते जी मरे समान हो जाते थे। यदि कोई वृद्ध व्यक्ति, जीने की इच्छा रखता, स्वाद या पहनने-ओढ़ने की सुविधा चाहता, खुश रहता, गाने या नाचने कि इच्छा करता तो - “सींघ कटा कर बछड़ों में शामिल होना है?”, “जब बूढ़ भये बुढ़ासा, तब रह-रह करें तमसा”, “चढ़ी जवानी बुड्ढे नू”, “बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम” या “शौकीन बुढ़िया, चटाई का लंहगा”- आदि कहावतों से नवाज़ा जाता था। वृद्धावस्था को जीवन के सुख और भोग से विहीन मान लिया जाता था। वृद्ध, ऐसी सामाजिक रूढ़ियों और उपलम्भों का बोझ उठाए; असल उम्र से दस-बीस साल और बूढ़ा, आमोद-प्रमोद, सुख-सुविधा से वंचित, जीवित-शव बन कर रह जाता था।


समय बदला, आर्थिक प्रगति हुई। भारतीय पुरुषों की औसत उम्र बढ़ी, कम बच्चे और स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण महिलाओं की मृत्यु दर घटी और औसत उम्र में भी इज़ाफ़ा हुआ। सीनियर सिटीज़, चूंकि नौकरी-पेशा रहे या अपना धंधा-व्यापार, तो आर्थिक रूप से सक्षम हुए। अपनी अगली पढ़ी को उन्होंने सुविधाएं दीं, फलतः बच्चे पढ़ाई करके देश-विदेश में नौकरी, व्यवसाय आदि करके; आर्थिक रूप से स्वतन्त्र हुए। सामाजिक ढांचे में मूलभूत परिवर्तन हुए।


आज, “साठ साल के बूढ़े या साठ साल के जवान?” का ज़माना है। बूढों का स्वास्थ सत्तर-पचहत्तर साल तक ठीक रहता है। आर्थिक स्थिति अच्छी है, घर है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है। मात्र मूल आवश्यकताएं चलाने से अधिक संसाधन हैं। नई पीढ़ी पर अब मां-बाप, आर्थिक रूप से आश्रित नहीं। एक बड़ा वर्ग आज आत्मनिर्भर है। साठ-पैंसठ साल के स्त्री पुरुष, एवरेस्ट के बेस कैम्प तक चढ़ाई कर रहे हैं, देश-विदेश की यात्राएं कर रहे हैं, अपने दम पर, संसाधनों पर सुख से जीने का प्रयत्न कर रहे हैं। सीनियर सिटीज़ हैं वो बूढ़े-जलापा नहीं। सब सुविधा हैं तो जीवन में बुढ़ापा ओढ़ने और सामाजिक अपवाद से डरने की ज़रूरत भी नहीं है।


उम्र का कोई भरोसा ना कभी था ना होगा। फलतः विधुर और विधवा आज भी हैं। आज एकल परिवार में ऐसे एकाकी बुजुर्ग केलिए बहुत सी दिक्कतें और चुनौतियां हैं। क्योंकि बच्चे या तो शहर, या देश से बाहर हैं, बेटी है तो वह भी नौकरी कर रही है या उसका ब्याह हो चुका है। एकल परिवार की यह त्रासदी है कि, वृद्धावस्था में बुज़ुर्ग मां-बाप, अकेले हो जाते हैं। जब तक पति-पत्नी दोनों ही जीवित हैं; अधिक दिक्कत नहीं होती। एकाध नौकर-नौकरानी के सहारे जीवन कटता रहता है। दोनों एक-दूसरे का दुःख-दर्द बांट लेते हैं। कोई बीमार हुआ तो देखभाल कर लेते हैं या अस्पताल तक पहुंचा देते हैं।


आज का बुजुर्ग मृतप्राय, जीवन से विरक्त प्राणी बन कर नहीं जीना चाहता। क्योंकि मनुष्य मात्र की  इच्छाएं, सपने और शौक; आजीवन मरते नहीं ना ही मरती है सुख पाने की अभिलाषा… उम्र मात्र एक गिनती है। 


ऐसे में यदि एकाकी स्त्री या पुरुष जीवन सांध्य में, जीवन साथी की चाह कर रहे हैं; तो यह अस्वाभाविक क्यों माना जा रहा है??? क्यों हमारी परंपराएं और बेड़ियां आड़े आ रही हैं? क्यों हम इस आवश्यकता को स्वीकार नहीं पा रहे हैं? क्यों इसे 'टैबू' मान रहे हैं? क्यों उपहास कर रहे हैं? 

क्या बुजुर्गों को साथ-प्यार की ज़रूरत महसूस नहीं होती? जिसके बच्चे अपने काम-धंधे से बाहर हैं, बच्चों पर उनके बच्चों की जिम्मेदारी है। पिता या मां, एकाकी किसी शहर के एक घर में अकेले रह रहे हैं। रिश्ते-नाते भी किसी का कितना भला करते हैं?


ऐसे में यदि कोई घर में फिसल कर चोट खा जाए? किसी को दिल का दौरा पड़ जाए? इसी तरह की कोई भी दिक्कत या दुर्घटना हो जाए तो… कोई उनकी जानकारी देने वाला या वाली भी नहीं रहेगा? यदि वे फ़ोन न कर पाए तो किसी को कोई जानकारी नहीं होगी कि अमुक को चोट लगी है, या दिल का दौरा पड़ा है या ब्रेन स्ट्रोक हो गया है या हड्डी टूट गई है आदि आदि…


जिसकी चिकित्सा सम्भव है वो भी असम्भव हो जायेगा। कहते हैं कि, “जीवन साथी की सबसे अधिक आवश्यकता बुढ़ापे में होती है।” दो समवयस्क व्यक्ति, यदि अपने सुख-दुःख साझा करके, एक दूसरे का सहारा बन कर बुढ़ापे को सह्य और सुखद बना सकते हैं तो इसमें आपत्ति क्या है?


यदि कोई एकाकी वृद्ध या वृद्धा जीवन-साथी खोज रहे हैं तो उसमें अनैतिक, असामाजिक और आपत्तिजनक क्या है??? बुढ़ापे का विवाह यौन-सुख या सन्तान प्राप्ति के लिए तो सम्भव नहीं है। चलिए मान लेते हैं कि यौन सुख भी शामिल है, तो भी हमारे पूर्वज “धर्म, अर्थ काम, मोक्ष” को पुरुषार्थों की श्रेणी में रख गए हैं। 


कामेच्छा भी कोई अप्राकृतिक इच्छा नहीं है। यह है; तभी धरती पर जीवन है, बच्चे हैं, युवा हैं। 'काम' जीवन को सरस बनाता है, पति-पत्नी का सम्बन्ध ही कामाश्रित है। बात यहां भिन्न इसलिए है कि प्रजावर्धन इस उम्र में सम्भव नहीं। यदि सम्भव भी हो, तो शिशु के स्वास्थ्य की कोई गारंटी नहीं। सबसे बड़ी बात, भारत के परिप्रेक्ष्य में यह भी है कि, देश जनसंख्या आधिक्य से पहले से ही पीड़ित है। लेकिन गर्भ निरोधक साधनों से इसका कोई भय नहीं रह जाता। 


यदि इस तथ्य से इन्कार करना चाहते हैं या आँखें चुराना चाहते हैं तो, कुछ आंकड़े ज़रूर देखें कि पॉर्न साइट का उपयोग भारतीय उपमहाद्वीप में काफ़ी अधिक है। मानी हुई बात है कि नौकरी-पेशा, पढ़ाई आदि संघर्षों में व्यस्त रहने वाली युवा-पीढ़ी की तुलना में सीनियर सिटीज़्स के पास अधिक समय है और मन… ये उम्र की सीमा से कब बंधा है???(बस अपने तक सीमित रखना है, पढ़ना, स्वीकारना सभी का निरा निजी मामला है, ये सामाजिक स्वीकारोक्ति नहीं है)


उपरोक्त बातें मात्र शंका निवारण और सामान्य रूप से उठने वाले प्रश्न का उत्तर है। प्रमुख मुद्दा है एक सहारा, कुछ सुविधाएं, बीमारी या आकस्मिक दुर्घना पर कोई ऐसा हो जो एंबुलेंस, रिश्तेदारों को सूचित कर सके। जीवन के लिए 'फर्स्ट-एड' की तरह आवश्यक। इसके अतिरिक्त वृद्ध जीवन में  थोड़ी सी खुशी, तनिक सी सुविधा…कौन सा जघन्य अपराध है?


एक विदेशी वृद्ध महिला से 'बाली'(इंडोनेशिया) में मुलाकात हुई। वह पैंसठ साल की थी, उसके दो बच्चे अमेरिका में बसे थे, तीन नाती पोते थे। वह ख़ुद ऑस्ट्रेलिया से, बाली घूमने आई थीं। अपने पति के साथ, जो सत्तर वर्ष के थे, जिन्होंने पाँच साल पहले ये विवाह किया था।


महिला ने बताया कि, पहले पति की मृत्यु और बच्चों के विवाह और विदेश में बसने के बाद; वह डिप्रेशन का शिकार हो कर, कई बीमारियों से ग्रस्त बिस्तर में पड़ी थी। चिकित्सा के दौरान, आज के पति उसे मिले थे। वह डॉक्टर थे, विधुर थे। दवा लम्बी चली। इस दौरान दोनों को एक दूसरे को समझने का मौका मिला। दवाओं के साथ किसी हमदर्द का साथ पाकर, महिला का स्वास्थ्य सुधरा। फिर दोनों ने अपने-अपने बच्चों को बता कर शादी की और सुख से रह रहे हैं। 


इस समय दस दिन के लिए, बाली घूमने आए हैं। आप सोचिए क्या ये दोनों बुज़ुर्ग यदि अलग-अलग, अपने दुःखों में डूबे, जीवन जीते रहते या किसी एक बच्चे पर या बारी-बारी से सभी बच्चों के ऊपर बोझ बने जीते तो; क्या उनके मन में ये विचार भी आता कि विश्व पर्यटन करें? अपनी स्वयं की जिन्दगी आत्मनिर्भर हो कर जियें?


आप ही बताएं इसमें आपको क्या दोष नज़र आता है? ऐसा भारत में क्यों नहीं हो सकता? इसमें कौन सी असामाजिकता या अनैतिकता है? कहां रूढ़ियां टूट रही हैं? यही वह भारत है; जहां बाल-विधवा आजीवन, मात्र अपने शारीरिक और मानसिक जरूरतों की अनदेखी करती, जीवनजीने की सज़ा भोगती थीं? फिर विधवा-विवाह केलिए प्रयत्न हुए। सतीप्रथा को ख़त्म करने वालों का नाम इतिहास में अमर हो गया। यानी रूढ़ियों का टूटना ज़रूरी है। 


हम भारतीय हैं। जहां धर्म की परिभाषा है - धारणात् धर्मः इत्याहुः धर्मों धारयति प्रजाः। यानी जो प्रजा(जनसंख्या) को धारण करे वह ही धर्म है। ऐसे में वृद्ध- विधुर या वृद्धा-विधवाओं के विवाह को हम मान्यता क्यों नहीं दे सकते? आप सभी सुधी पाठकों का आह्वान है, ऐसे ज्वलन मुद्दे को समझने और बेबाक राय देने को।


यदि यह लेख भी अनैतिक और अभद्र मान कर कहीं प्रकाशित न हुआ तो आप सभी तक कभी नहीं पहुँच सकेगा, लेकिन यदि प्रकाशित हो कर आप सभी तक पहुँचे तो आप लोगों की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।


बदलाव स्वाभाविक है, युग बदलता है तो युगधर्म भी बदलता है। बदलाव का अस्वीकार मनुष्य का स्वभाव है लेकिन बदलने की शक्ति भी मानव के पास है।


-शैली 

सेक्टर 4,गोमतीनगर विस्तार,

लखनऊ, उत्तर-प्रदेश 

9140076535




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