स्नेह की डोर- डॉ गीता सिंह



उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव चिरैया में रामप्रसाद जी का बड़ा संयुक्त परिवार रहता था। मिट्टी की सोंधी खुशबू, आँगन में तुलसी का चौरा, बरामदे में रखी पुरानी चारपाइयाँ और रसोई से उठती रोटी की महक—सब मिलकर उस घर को केवल मकान नहीं, बल्कि प्रेम का सुंदर घरौंदा बनाते थे। गाँव के लोग जब भी प्रेम, संस्कार और एकता की मिसाल देते, तो सबसे पहले रामप्रसाद जी के परिवार का नाम लिया जाता।

रामप्रसाद जी ने पूरी ज़िंदगी कठिन परिश्रम करके अपने परिवार को सँवारा था। खेतों में दिन-रात मेहनत करके उन्होंने थोड़ी-थोड़ी जमीन जोड़ी थी। उनके दो बेटे थे—राजेश और अनुपम दोनों बहुएँ, बच्चे, और उनकी वृद्ध माँ पत्नी ने तो उनका साथ उनके बच्चो के बचपन में ही छोड़ दिया था,पर अब ये पूरा परिवार मिलकर एक ही छत के नीचे रहते थे। शाम होते ही पूरा परिवार आँगन में इकट्ठा हो जाता। बच्चे दादी से कहानियाँ सुनते, बहुएँ रसोई में हँसते-बोलते काम करतीं और दोनों भाई पिता के साथ बैठकर खेती और कारोबार की बातें करते रामप्रताप जी भी पत्नी के ना होने का ग़म भूलने की कोशिश करते और अपने बच्चो में ही अपनी ख़ुशी खोज लेते थे, अपने परिवार ख़ुश देख कर इसे अपने जीवन के कठिन मेहनत का प्रतिफल मानते और संतोष महसूस करते थे ।उन्हें लगता था कि भगवान ने उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा धन दे दिया है—“एकजुट परिवार।”

लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता।

धीरे-धीरे घर के भीतर छोटी-छोटी बातों ने जगह बनानी शुरू कर दी। कभी रसोई के खर्च को लेकर बहस होती, कभी बच्चों की पढ़ाई को लेकर तकरार। कभी एक बहू को लगता कि दूसरी को ज्यादा सम्मान मिलता है, तो कभी भाइयों को यह लगने लगा कि उनके हिस्से का काम और जिम्मेदारियाँ बराबर नहीं हैं।

जो घर कभी हँसी से गूँजता था, वहाँ अब धीरे-धीरे कटु शब्द सुनाई देने लगे।

रामप्रसाद जी रात को देर तक जागते रहते। बरामदे में बैठकर आसमान की ओर देखते और सोचते—

“क्या यही वो घर है जिसे मैंने प्रेम से बनाया था?”

उनकी बूढ़ी माँ, जो अब ठीक से चल भी नहीं पाती थीं, अक्सर चुपचाप आँसू पोंछ लिया करतीं। उन्हें डर था कि कहीं उनकी आँखों के सामने परिवार टूट न जाए।

रामप्रसाद जी की सबसे बड़ी उम्मीद उनकी बड़ी बहू उर्मिला थी।

सवो जब इस घर में ब्याह कर आई थी तो मानो अपने साथ संस्कारों की रोशनी लेकर आई थी। उसकी आवाज़ में अपनापन था, व्यवहार में विनम्रता और दिल में पूरे परिवार के लिए सम्मान। वह हमेशा कहती—

“परिवार रिश्तों से चलता है, अधिकारों से नहीं।”

वह सबको साथ रखने  की कोशिश भी करती, लेकिन हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे थे।

एक दिन वह हुआ, जिससे रामप्रसाद जी सबसे ज्यादा डरते थे।

संपत्ति के बँटवारे को लेकर दोनों भाइयों के बीच भयंकर विवाद हो गया। बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने अलग होने का निर्णय ले लिया। घर का आँगन, जो कभी बच्चों की हँसी से भर जाता था, उस दिन चीखों और कटु शब्दों से काँप उठा।

राजेश क्रोध में बोला—

“अब साथ रहना संभव नहीं है!”

अनुपम ने भी गुस्से में कह दिया—

“हाँ, अब बँटवारा ही सही रहेगा।”

रामप्रसाद जी यह सब सुनते रहे। उनके हाथ काँपने लगे। उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

उन्होंने भारी आवाज़ में कहा—

“बेटा… यह जमीन मैंने इसलिए नहीं जोड़ी थी कि एक दिन यह तुम्हें एक-दूसरे से अलग कर दे। मैंने सोचा था कि बुढ़ापे में तुम सबके साथ चैन से रहूँगा… लेकिन आज यही संपत्ति मेरे परिवार को निगल रही है।”

उनकी बूढ़ी माँ फूट-फूटकर रो पड़ीं।

उसी क्षण उर्मिला दोनों भाइयों के बीच आकर खड़ी हो गई।

उसकी आँखों में भी आँसू थे, लेकिन आवाज़ में दृढ़ता।

वह बोली—

“रुक जाइए! एक बार अपने बच्चों की तरफ देखिए। वे डरे हुए कोने में खड़े हैं। आज आप लोग संपत्ति बाँटेंगे, कल ये बच्चे रिश्ते बाँटना सीख जाएँगे।”

पूरा घर शांत हो गया।उर्मिला कहती गई 

“घर दीवारों और जमीन से नहीं बनता… घर बनता है प्रेम, त्याग और विश्वास से। अगर रिश्ते टूट गए, तो यह बड़ा मकान भी खाली लगने लगेगा। सोचिए, जब आप बूढ़े होंगे और बच्चे भी यही सीखकर आपसे दूर हो जाएँगे, तब क्या यह संपत्ति आपको सहारा दे पाएगी?”

उसकी बातें सीधे सबके दिल में उतर रही थीं। अपना भविष्य सोचकर राजेश और अनुपम घबरा गए उर्मिला 

बच्चों की ओर देखकर बोली—

“ये बच्चे हमसे संस्कार सीखते हैं। अगर हम ही लालच और झगड़े में डूब जाएँगे, तो आने वाली पीढ़ी प्रेम का मूल्य कैसे समझेगी?”

उस दिन पहली बार दोनों भाइयों के चेहरे पर पश्चाताप दिखाई दिया। क्यों की उर्मिला ने उन्हें उनका भविष्य दिखा दिया था।

उस रात घर में किसी ने ठीक से खाना नहीं खाया।

लेकिन उर्मिला ने हार नहीं मानी।

अगले दिन से उसने परिवार को जोड़ने के छोटे-छोटे प्रयास शुरू किए। उसने नियम बनाया कि रात का भोजन पूरा परिवार साथ बैठकर करेगा। शुरुआत में सब चुपचाप बैठते, लेकिन धीरे-धीरे बातचीत होने लगी।

त्योहारों पर उसने सबको साथ पूजा करने के लिए प्रेरित किया। बच्चों को दादी के पास बैठाकर कहानियाँ सुनवाने लगी। घर में फिर से धीमे-धीमे अपनापन लौटने लगा।

फिर एक दिन ऐसा आया जिसने पूरे परिवार की सोच बदल दी।

छोटी बहू रीना अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। उसकी हालत इतनी खराब हो गई कि वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। कई दिनों तक उसे तेज बुखार रहा। वह कमजोर होकर टूट सी गई थी।

उस समय उर्मिला ने जो किया, उसने सबका हृदय बदल दिया।

वह दिन-रात रीना की सेवा में लगी रहती। समय पर दवा देना, खाना बनाना, बच्चों को संभालना, रात-रात भर जागकर उसके सिर पर ठंडी पट्टियाँ रखना—उसने हर जिम्मेदारी बिना किसी शिकायत के निभाई।

एक रात रीना की आँख खुली।

उसने देखा कि उर्मिला उसके पैरों के पास बैठी-बैठी ही सो गई थी। उसके हाथ अब भी रीना के माथे पर रखे थे।

रीना की आँखों से आँसू बह निकले।

उसे याद आने लगा कि कैसे उसने छोटी-छोटी बातों पर उर्मिला से बहस की थी, कैसे उसने मन में दूरी बना ली थी।

वह फूट पड़ी—

“दीदी… मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपको कभी समझा ही नहीं और न ही परिवार के महत्व को समझा मैं तो केवल अपने सुख की कामना करती रही ।आज अगर आप न होतीं, तो शायद मैं टूट जाती…” मेरे बच्चे का क्या होता वो अनाथ हो जाता मेरे पति का क्या होता…

उर्मिला ने तुरंत उसके होंठों पर हाथ रख दिया और मुस्कुराकर बोली—

“पगली… परिवार में माफी नहीं, परिवार का मतलब ही होता है एक दूसरे के और दुख में साथ खड़े रहना परिवार का मतलब ही होता है केवल अपनापन ।

रीना रोते हुए उससे लिपट गई।

उस दिन पहली बार पूरे घर ने महसूस किया कि रिश्तों की असली ताकत क्या होती है।

धीरे-धीरे दोनों भाइयों की सोच भी बदलने लगी। उन्हें एहसास हुआ कि अगर परिवार टूट गया, तो केवल घर नहीं टूटेगा—बच्चों के संस्कार टूट जाएँगे, बुजुर्गों का सहारा टूट जाएगा और जीवन का सुकून खत्म हो जाएगा।

एक शाम दोनों भाई रामप्रसाद जी के पास आए।

राजेश ने पिता के चरण पकड़ लिए—

“बाबूजी… हमें माफ कर दीजिए। हम लालच में अंधे हो गए थे।”

अनुपम भी रो पड़ा—

“अब यह घर कभी नहीं टूटेगा।”

रामप्रसाद जी की आँखें भर आईं।

उन्होंने दोनों बेटों को गले लगा लिया।

बरसों बाद उस घर में फिर वही पुरानी हँसी लौट आई। आँगन फिर बच्चों की किलकारियों से गूँज उठा। दादी के चेहरे पर फिर से मुस्कान लौट आई।

उस दिन रामप्रसाद जी देर तक आँगन में बैठे रहे। उनकी आँखों में संतोष था। उन्होंने आसमान की ओर देखकर धीरे से कहा—

“हे भगवान… मेरा परिवार बच गया।”

गाँव के लोग भी इस परिवर्तन को देखकर आश्चर्यचकित थे। लोग कहते—

“जिस घर में टूटन आ चुकी थी, वहाँ एक बहू ने अपने प्रेम, त्याग और संस्कारों से फिर से रिश्तों में जान डाल दी।”

समय बीतता गया, लेकिन उस परिवार ने एक बात हमेशा याद रखी—

संपत्ति से घर बड़ा हो सकता है,
पर प्रेम ही उसे परिवार बनाता है।

डॉ गीता सिंह 
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
99930 39489



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