आधुनिक युग को प्रतिस्पर्धा और महत्वाकांक्षा का युग कहा जाता है। प्रत्येक व्यक्ति जीवन में अधिक सफलता, धन, प्रतिष्ठा और सुविधाएँ प्राप्त करना चाहता है। महत्वाकांक्षा मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है, परंतु जब यही महत्वाकांक्षा आवश्यकता से अधिक बढ़ जाती है, तब वह व्यक्ति और उसके परिवार दोनों के लिए हानिकारक सिद्ध होती है। आज अनेक परिवार अति महत्वाकांक्षा की भेंट चढ़ते दिखाई दे रहे हैं।मानव जीवन केवल व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं है, बल्कि वह परिवार और समाज के सहारे विकसित होता है। परिवार व्यक्ति की पहली पाठशाला माना जाता है, जहाँ उसे संस्कार, प्रेम, सहयोग और जिम्मेदारी का ज्ञान मिलता है। परंतु आधुनिक समय में परिवार व्यवस्था में तेजी से बदलाव आए हैं। बढ़ती भौतिकता, व्यस्त जीवनशैली और व्यक्तिगत स्वार्थ ने रिश्तों की नींव को कमजोर कर दिया है। इसका प्रभाव केवल परिवार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे सामाजिक परिवेश पर दिखाई देने लगा है।
पहले परिवारों में प्रेम, त्याग, सहयोग और सामूहिकता का भाव प्रमुख होता था। लोग सीमित साधनों में भी संतुष्ट रहते थे और परिवार के साथ समय बिताना जीवन का सबसे बड़ा सुख माना जाता था। लेकिन आज सफलता की अंधी दौड़ ने जीवन की प्राथमिकताओं को बदल दिया है। लोग धन और करियर को इतना महत्व देने लगे हैं कि परिवार के लिए समय ही नहीं बचता।अत्यधिक महत्वाकांक्षा का सबसे बड़ा प्रभाव पारिवारिक रिश्तों पर पड़ता है। माता-पिता अपने कार्य और करियर में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि बच्चों को पर्याप्त समय और संस्कार नहीं मिल पाते। पति-पत्नी के बीच संवाद कम होने लगता है और आपसी समझ कमजोर पड़ जाती है। परिणामस्वरूप तनाव, विवाद और अलगाव जैसी समस्याएँ जन्म लेने लगती हैं।
आज कई लोग बेहतर नौकरी, अधिक वेतन और सुविधाओं के लिए अपने परिवार से दूर शहरों या विदेशों में रहने लगे हैं। भौतिक सुख तो बढ़ते हैं, परंतु रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। वृद्ध माता-पिता अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं और बच्चों का भावनात्मक विकास प्रभावित होता है। परिवार एक छत के नीचे रहकर भी भावनात्मक रूप से बिखरने लगता है।अति महत्वाकांक्षा केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। सामाजिक प्रतिष्ठा और दूसरों से आगे निकलने की चाह भी परिवारों को प्रभावित कर रही है। तुलना और प्रतिस्पर्धा के कारण व्यक्ति मानसिक तनाव का शिकार हो जाता है। वह सफलता प्राप्त करने के लिए नैतिक मूल्यों और पारिवारिक जिम्मेदारियों की उपेक्षा करने लगता है।
इस समस्या का समाधान संतुलित जीवन दृष्टि में निहित है। महत्वाकांक्षा होना आवश्यक है, क्योंकि वही प्रगति का आधार है, लेकिन परिवार और मानवीय संबंधों की कीमत पर नहीं। व्यक्ति को अपने कार्य और परिवार के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। परिवार के साथ समय बिताना, संवाद बनाए रखना और भावनात्मक संबंधों को महत्व देना अत्यंत आवश्यक है।
अंततः कहा जा सकता है कि परिवार जीवन की सबसे बड़ी शक्ति और आधार है। यदि महत्वाकांक्षा परिवार को ही तोड़ दे, तो ऐसी सफलता का कोई मूल्य नहीं रह जाता। सच्ची सफलता वही है, जिसमें व्यक्ति अपने सपनों को पूरा करने के साथ-साथ अपने परिवार को भी प्रेम, सम्मान और समय दे सके।
डॉ शीला शर्मा
बिलासपुर
95895 91992

0 टिप्पणियाँ