चीनी से भी ज्यादा गुड़ को, मंहगा होते देखा है।
घड़ियाली आंसू वाले, एक ठग को रोते देखा है।।
बेहद हल्के गहने भी अब, नहीं गढ़ा पाएगा वह।
तोड़ गरीबों की मंशा को, उसको सोते देखा है।।
साधू संत फकीरों को भी,कुर्सी की लालच इतनी।
बीज जहर के गांव-गांव में, इनको बोते देखा है।।
जिम्मेदारी इस बच्चे ने,ओढ़ लिया बचपन में ही।
बोझ उठाकर सिरपर अपने, हमने ढोते देखा है।।
उसका सीना उसकी सेना, लंबी चौड़ी है तो है।
मैंने तो अपनी आंखों से,सबकुछ खोते देखा है।।
तुमको अहंकार है इतना,करते हो मनमानी तुम।
लाखों थे रावण के मरते, नाती पोते देखा है।।
चोरों का सरदार लगा है,साबित हो हैं चोर सभी।
दौड़ लगाते इनके उनके, पीछे तोते देखा है।।
जैसी करनी वैसी भरनी, एक दिन नैया डूबेगी।
बड़े-बड़े तैराकों को भी, खाते गोते देखा है।।
नशा चढ़ा सत्ता का ऐसा,दिखते हम दो कौड़ी के।
इन लोगों को नेताओं के, पांव को धोते देखा है।।...
डॉ. प्रमोद कुमार "अनंग"

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