वर्तमान समय में महावारी (मासिक धर्म) को लेकर समाज में खुलकर चर्चा करने का अभियान चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े मिथकों को दूर करना, स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा इस विषय को अनावश्यक शर्म और संकोच से मुक्त करना है। निस्संदेह, यह एक आवश्यक और सकारात्मक प्रयास है, क्योंकि महावारी एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया है और इसके बारे में महिलाओं तथा पुरुषों दोनों को सही जानकारी होना आवश्यक है।
किन्तु जागरूकता और अभिव्यक्ति के तरीकों पर भी विचार किया जाना चाहिए। भारतीय समाज में कुछ विषय ऐसे रहे हैं जिन्हें गरिमा, मर्यादा और निजता के साथ देखा जाता है। महावारी भी महिलाओं के निजी जीवन और उनकी अस्मिता से जुड़ा विषय माना जाता रहा है। इसलिए जब इसके नाम पर सार्वजनिक सड़कों पर अत्यधिक प्रदर्शनात्मक कार्यक्रम, नारेबाजी या ऐसे आयोजन किए जाते हैं जो सामाजिक संवेदनशीलता को चुनौती देते प्रतीत हों, तब समाज के एक वर्ग में असहजता उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
जागरूकता का अर्थ केवल किसी विषय को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना नहीं है। वास्तविक जागरूकता तब आती है जब विद्यालयों, परिवारों, स्वास्थ्य केंद्रों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से वैज्ञानिक तथा संवेदनशील जानकारी लोगों तक पहुंचाई जाए। यदि उद्देश्य महिलाओं के स्वास्थ्य की रक्षा और सामाजिक भ्रांतियों का निवारण है, तो इसके लिए अनेक गरिमापूर्ण और प्रभावी माध्यम उपलब्ध हैं।
भारतीय संस्कृति का मूल भाव संयम, शालीनता और सम्मान में निहित है। संस्कृति का अर्थ किसी विषय पर मौन रहना नहीं, बल्कि उस विषय पर उचित भाषा, उचित मंच और उचित तरीके से संवाद स्थापित करना है। इसलिए महावारी पर चर्चा होनी चाहिए, पुरुषों की सहभागिता भी होनी चाहिए, लेकिन यह सब सामाजिक मर्यादा और सांस्कृतिक संवेदनाओं का ध्यान रखते हुए किया जाए तो उसका प्रभाव अधिक सकारात्मक होगा।
अंततः आवश्यकता इस बात की है कि हम दो अतियों से बचें—एक ओर महावारी को ऐसा विषय मान लेना जिस पर बात ही न की जाए, और दूसरी ओर जागरूकता के नाम पर ऐसी सार्वजनिकता को बढ़ावा देना जो विषय की गरिमा को कम कर दे। स्वस्थ समाज वही है जो ज्ञान और संस्कृति, दोनों के बीच संतुलन स्थापित कर सके। महावारी पर संवाद आवश्यक है, परंतु वह संवाद गरिमामय, संवेदनशील और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए।
महावारी पर जागरूकता समय की मांग है, किंतु जागरूकता का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जो महिलाओं के सम्मान, निजता और सामाजिक मर्यादा को बनाए रखते हुए समाज को शिक्षित करे। ज्ञान और संस्कृति का संतुलन ही इस विषय पर सार्थक विमर्श का आधार बन सकता है।
डॉ शीला शर्मा
बिलासपुर,

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