जगन्नाथ रथयात्रा : दोहामाला

 विवेक रंजन श्रीवास्तव
१. मंगलाचरण
जग के नाथ जगन्नाथ, भक्तों के आधार।
रथयात्रा का पर्व यह, मंगलमय त्योहार॥
२. कठोपनिषद् का संदेश
तन रथ, बुद्धि सारथी, मन लगाम सुजान।
आत्मा रथ की स्वामिनी , कहे श्रुति का ज्ञान॥
३. संयम का पथ
इन्द्रिय चंचल अश्व सम, दौड़ें चारों ओर।
संयम इनकी डोर है, पायें सत्य की ठौर॥
४. श्रीक्षेत्र पुरी
नीलाचल पर राजते, जगन्नाथ भगवान।
सागर चरण पखारता, गाता महिमा-गान॥
५. त्रिदेव स्वरूप
बलभद्र, सुभद्रा सहित, शोभित काष्ठ विग्रह।
प्रेम, समता, बंधुत्व का, करें शुभ अनुग्रह॥
६. दारु-ब्रह्म
दारु-विग्रह दिव्य हैं, अद्भुत उनकी शान।
भाव-भक्ति से जो भजे, पाए प्रभु का धाम॥
७. रथयात्रा
आषाढ़ी शुभ द्वितिया, निकले पावन रथ।
खींचें मिलकर भक्तजन, प्रेम होय समर्थ॥
८. भक्ति का संदेश
रथ की रस्सी प्रेम की, खिंचे चले भगवान।
रथयात्रा सिखला रही, भक्ति की शक्ति महान॥
९. समरसता
जाति-पाँति सब भूलकर, जुड़ें प्रेम के साथ।
जगन्नाथ के प्रसाद में, मिलता सबको भात॥
१०. अंतर्यात्रा
चलते रथ सम भक्त सब , भीतर जागे चेत।
मन जीतें , संयम करें , वे ही साधक श्रेष्ठ॥
११. उपनिषद् का सार
कठ का गूढ़ उपदेश यह, पुरी करे साकार।
जीवन-रथ संयम चले, खुलें मोक्ष के द्वार॥
१२. मंगलकामना
तन रथ, मन लगाम हो, बुद्धि बने पतवार।
जगन्नाथ की कृपा से, हो भवसागर पार॥

जय जगन्नाथ!

 काल जहाँ आराध्य बने...

॥ अवंतिका महिमा ॥
1.
कण-कण में है यहाँ,
शिव का दिव्य निवास।
जो भी आये प्रेम से,
पाये सुख-विश्वास॥
2.
बारह ज्योतिर्लिंगों में,
महिमा अमित विशाल।
भक्तों के सरताज हैं,
बाबा श्री महाकाल॥
3.
भोर भये, मंदिर खुले,
गूँजे जय-जयकार।
महाकाल के द्वार पर,
उमड़े भीड़ अपार॥
4.
भस्म आरती देख कर,
पिघले मन-अभिमान।
राख सिखाती है हमें,
क्षणभंगुर इंसान॥
5.
श्मशान की भस्म से,
सजता भोले भाल।
जीवन का सच बोलते,
भक्तों के महाकाल॥
6.
कल-कल करती शिप्रा,
निर्मल पावन नीर।
जिसके तट पर गूँजते,
शिव-भक्ति के गीत॥
7.
सिंहस्थ की भीड़ में,
साधु-संत विशाल।
हर-हर महादेव से,
गूँजे महाकाल॥
8.
हरसिद्धि माँ के द्वार पर,
दीपस्तंभ उजियार।
ममता की वह रोशनी,
जगमग हो संसार॥
9.
कालभैरव धाम का,
अद्भुत दिव्य विधान।
मदिरा भी प्रसाद बन,
पाती है सम्मान॥
10.
भैरव बाबा की कृपा,
रखती सबकी लाज।
खाली झोली भर उठे,
बनते सारे काज॥
11.
चित्रगुप्त दरबार में,
खुलती कर्म-किताब।
जैसा लिखता आदमी,
वैसा मिले जवाब॥

12.
नवग्रह सारे बोलते,
शुभ कर्मों की बात।
शिव-कृपा के सामने,
मिट जाती हर घात॥

13.
वेधशाला आज भी,
पढ़ती नभ के छंद।
तारों में इतिहास है,
ग्रहों में आनंद॥

14.
वैदिक घड़ी बतला रही,
समय बड़ा बलवान।
पल बीता फिर कभी भी,
पा न सके इंसान॥

15.
गुरु सांदीपनि आश्रम,
ज्ञान-सुधा का धाम।
यहीं पढ़े बलराम संग,
स्वयं सुदामा श्याम॥

16.
गुरु-सेवा की सीख से,
उज्ज्वल हुआ समाज।
विद्या संग विनय रहे,
यही धर्म का राज॥

17.
कालिदास की लेखनी,
यहीं पर भरे उड़ान।
मेघदूत की पंक्ति में,
मिलता हिंदुस्तान॥

18.
विक्रम की इस भूमि की,
कीर्ति रही अपार।
न्याय, नीति, साहस बना,
जिसका दृढ़ आधार॥

19.
मंदिर, घाट, वीथिका,
गाएँ शिव का नाम।
चलते-चलते मिल गया,
मन के चारों धाम॥

20.
घंटों की झंकार में,
घुलता मधुर उजास।
हर धड़कन में बस गया,
भोले का विशाल॥

21.
धर्म, ज्ञान, विज्ञान का,
अनुपम यह आधार।
भारत के मस्तक सजा,
अवंतिका श्रृंगार॥

22.
जो भी आये भाव से,
छोड़ सभी जंजाल।
उसको अपनी शरण में,
लेते हैं महाकाल॥

23.
शिप्रा, शिव, शक्ति मिले,
धन्य हुआ हर काल।
अवंतिका की शान हैं,
बाबा महाकाल॥

24.
भारत-भू का गौरवमय,
यह पावन भू-भाल।
जय-जय पुण्य उज्जयिनी,
जय-जय महाकाल॥

— विवेक रंजन श्रीवास्तव
॥ हर-हर महादेव ॥

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