श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मुस्लिम लीग के साथ सरकार बनाई थी-सुरेश चौधरी

क्या श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सच में मुस्लिम लीग के साथ सरकार बनाई थी?

सोशल मीडिया के दावों और इतिहास के पन्नों का एक निष्पक्ष विश्लेषण
आज श्यामाप्रसाद मुखर्जी के जन्म दिवस पर विशेष।

भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे किस्से हैं, जो वक्त-बेवक्त हवा में तैरने लगते हैं। संसद की बहसों से लेकर सोशल मीडिया की रील्स तक, एक आरोप आपने भी कई बार सुना होगा— "डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार चलाई थी"। इस एक लाइन के भरोसे उनके पूरे राजनीतिक सफर को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
लेकिन क्या राजनीति के दावों और इतिहास के सच में कोई फर्क है? एक सजग नागरिक और इतिहास के पाठक के तौर पर हमारा काम किसी का अंध-विरोध या अंध-समर्थन करना नहीं, बल्कि सीधे तौर पर तथ्यों को खंगालना है। तो चलिए, आज बिना किसी राजनीतिक चश्मे के, इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और देखते हैं कि 1930 और 40 के दशक के उस अशांत बंगाल में असल में चल क्या रहा था।

1937 का बंगाल: जहाँ किसी को बहुमत नहीं मिला
इस पूरी गुत्थी को सुलझाने के लिए हमें थोड़ा पीछे, यानी 1937 में जाना होगा। जैसा कि **गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 (Government of India Act, 1935)** के दस्तावेज़ों में दर्ज है, ब्रिटिश सरकार ने प्रांतों को थोड़ी आज़ादी दी और पहली बार चुनाव कराए। उस दौर का बंगाल आज जैसा नहीं था— वह एक बहुत बड़ा, सामाजिक और धार्मिक रूप से बेहद संवेदनशील प्रांत था।
जब 1937 के चुनाव नतीजे आए, तो बंगाल की जनता ने किसी भी एक पार्टी को पूरा भरोसा नहीं दिया। **बंगाल लेजिस्लेटिव असेंबली डिबेट्स (1937–1943)** के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सदन की स्थिति कुछ इस तरह थी:
 * **कांग्रेस**: करीब 54 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी।
 * **मुस्लिम लीग**: लगभग 39 सीटें मिलीं।
 * **कृषक प्रजा पार्टी (KPP)**: शेर-ए-बंगाल कहे जाने वाले ए. के. फ़ज़लुल हक़ की इस पार्टी को 36 सीटें मिलीं।
कायदे से कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन उसने सरकार बनाने से पैर पीछे खींच लिए। वजह थी— कृषक प्रजा पार्टी के साथ जमीन सुधारों और लीडरशिप के मुद्दे पर बात न बन पाना। अब जब कांग्रेस विपक्ष में बैठ गई, तो सत्ता का वैक्यूम भरने के लिए फ़ज़लुल हक़ ने मुस्लिम लीग से हाथ मिला लिया और सरकार बना ली।
**यहाँ रुककर एक बात साफ कर लेना ज़रूरी है**: इस 1937 वाली सरकार में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कहीं नहीं थे। वे विपक्ष में बैठकर एक प्रखर नेता की तरह सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे थे।

जब जिन्ना और फ़ज़लुल हक़ के रास्ते अलग हुए
अक्सर लोग यहीं पर गच्चा खा जाते हैं। वे 1937 की सरकार और 1941 की सरकार को एक ही समझ लेते हैं, जबकि इन चार सालों में बंगाल की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव आ चुका था।
मार्च 1940 में मुस्लिम लीग ने लाहौर में 'पाकिस्तान प्रस्ताव' पास किया। इतिहासकार **हारुन-उर-रशीद अपनी पुस्तक 'द फोरशैडोइंग ऑफ बांग्लादेश: बंगाल मुस्लिम लीग एंड मुस्लिम पॉलिटिक्स' (The Foreshadowing of Bangladesh)** में लिखते हैं कि भले ही इस प्रस्ताव को फ़ज़लुल हक़ ने पढ़ा था, लेकिन वे बंगाल की अपनी स्वायत्तता चाहते थे, जबकि मोहम्मद अली जिन्ना पूरी ताकत अपने हाथ में केंद्रित करना चाहते थे। नतीजा यह हुआ कि 1940 के अंत तक दोनों के बीच मतभेद बहुत गहरे हो गए।
साल 1941 आते-आते यह झगड़ा खुलकर सामने आ गया। जिन्ना के मना करने के बावजूद फ़ज़लुल हक़ 'नेशनल डिफेंस काउंसिल' की बैठक में शामिल हो गए। जिन्ना ने इसे अनुशासनहीनता माना और दिसंबर 1941 में मुस्लिम लीग ने फ़ज़लुल हक़ की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया, जिससे उनका पुराना गठबंधन पूरी तरह टूट गया।

'प्रोग्रेसिव कोएलिशन': वह सरकार जिसने लीग को सत्ता से बाहर रखा
अब खेल बदल चुका था। मुस्लिम लीग सरकार गिराना चाहती थी, लेकिन फ़ज़लुल हक़ ने पासा पलट दिया। उन्होंने विधानसभा में मौजूद अन्य तमाम धड़ों को साथ मिलाकर एक नया मोर्चा बनाया, जिसे इतिहास में **'प्रोग्रेसिव कोएलिशन मिनिस्ट्री'** कहा गया।
इस नए मोर्चे में कौन-कौन शामिल था?
 * फ़ज़लुल हक़ की कृषक प्रजा पार्टी
 * डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हिंदू महासभा
 * फॉरवर्ड ब्लॉक के सदस्य (सुभाष चंद्र बोस के समर्थक विधायक, हालांकि नेताजी उस वक्त देश छोड़ चुके थे)
 * अनुसूचित जाति के प्रतिनिधि और कुछ निर्दलीय विधायक
**सबसे बड़ा सच:** इस नई सरकार में मुस्लिम लीग का एक भी मंत्री नहीं था। बल्कि, लीग इस सरकार की सबसे बड़ी दुश्मन थी और उसे गिराने के लिए दिन-रात एक कर रही थी।
इसी सरकार में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को वित्त मंत्री बनाया गया। वे उस दौर के सबसे पढ़े-लिखे लोगों में से एक थे और कलकत्ता यूनिवर्सिटी के कुलपति रह चुके थे। जैसा कि डॉ. मुखर्जी ने स्वयं अपनी डायरी और पत्रों के संकलन **'लीव्स फ्रॉम अ डायरी' (Leaves from a Diary)** में लिखा है, उनका उद्देश्य बंगाल के प्रशासन को सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक अस्थिरता से बचाना था। वे हक़ की हर नीति से सहमत नहीं थे, लेकिन लीग के एकाधिकार को रोकने के लिए सरकार के भीतर काम करना ज़रूरी मानते थे।
प्रसिद्ध इतिहासकार **आर. सी. मजूमदार अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया' (History of the Freedom Movement in India)** में स्पष्ट करते हैं कि ख्वाजा नज़ीमुद्दीन के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग इस सरकार को गिराने के लिए विधानसभा के भीतर और बाहर लगातार अभियान चला रही थी। आखिरकार 1943 में लीग इस सरकार को गिराने में कामयाब रही और उसके बाद बंगाल में उनके नेतृत्व में नई सरकार बनी। अब आप खुद सोचिए, अगर डॉ. मुखर्जी मुस्लिम लीग के सहयोगी होते, तो लीग उनकी ही सरकार को गिराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर क्यों लगाती?

भ्रम की राजनीति और इतिहास का फैसला
तो फिर यह कन्फ्यूजन पैदा कैसे हुआ? दरअसल, यह दो अलग-अलग कालखंडों की घटनाओं को आपस में मिला देने जैसा है।
 1. पहली घटना: 1937 में फ़ज़लुल हक़ ने मुस्लिम लीग के साथ सरकार बनाई (जिसमें मुखर्जी शामिल नहीं थे)।
 2. दूसरी घटना: 1941 में फ़ज़लुल हक़ मुस्लिम लीग से पूरी तरह अलग हो गए और हिंदू महासभा व फॉरवर्ड ब्लॉक के साथ मिलकर नई सरकार बनाई (जिसमें मुखर्जी वित्त मंत्री बने)।
इतिहासकार **जॉय चटर्जी अपनी किताब 'बंगाल डिवाइडेड: हिंदू कम्युनलिज्म एंड पार्टिशन' (Bengal Divided)** और **बी. डी. ग्राहम अपनी पुस्तक 'हिंदू नेशनालिज्म एंड इंडियन पॉलिटिक्स' (Hindu Nationalism and Indian Politics)** में भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि इन दोनों सरकारों का राजनीतिक आधार और कालक्रम बिल्कुल अलग था। आज के राजनीतिक विमर्श में इन दोनों को एक ही बताकर पेश कर दिया जाता है, जो कि ऐतिहासिक तथ्यों के साथ सरासर नाइंसाफी है।
इसका मतलब यह कतई नहीं है कि डॉ. मुखर्जी के फैसलों की आलोचना नहीं हो सकती। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय उनका रुख क्या था, या ब्रिटिश प्रशासन के साथ उनका पत्राचार कैसा था— इस पर इतिहासकार आज भी बहस करते हैं और लोकतंत्र में ऐसी आलोचनाएं जायज भी हैं। ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक दस्तावेज़ों **'द ट्रांसफर ऑफ पावर 1942-47' (The Transfer of Power)** में भी उस दौर की पेचीदगियों का ज़िक्र मिलता है।
लेकिन आलोचना हमेशा सच की बुनियाद पर होनी चाहिए, न कि किसी राजनीतिक प्रोपेगैंडा पर। इतिहासकार **लियोनार्ड गॉर्डन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'ब्रदर्स अगेंस्ट द राज' (Brothers Against the Raj)** में भी स्पष्ट किया है कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कभी मुस्लिम लीग के साथ सरकार नहीं बनाई। उन्होंने उस प्रोग्रेसिव गठबंधन का साथ दिया था, जो मुस्लिम लीग को सत्ता से दूर रखने के लिए बना था।
दिन के उजाले की तरह साफ इस सच को वाक्यों की हेराफेरी से बदला नहीं जा सकता, क्योंकि राजनीति भले ही नारों से चलती हो, इतिहास हमेशा अकाट्य दस्तावेज़ों से ही बात करता है।

(अधिक सटीक कथन यह होगा कि—
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उस गठबंधन सरकार में मंत्री बने थे, जो मुस्लिम लीग से अलग हो चुके ए. के. फ़ज़लुल हक़ के नेतृत्व में गठित हुई थी और जिसका मुस्लिम लीग स्वयं विरोध कर रही थी।
इतिहास के प्रति ईमानदारी की यही मांग है कि हम व्यक्तियों का मूल्यांकन संपूर्ण घटनाक्रम के आधार पर करें, न कि किसी एक वाक्य या राजनीतिक आरोप के आधार पर। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, किंतु इतिहास का निर्णय दस्तावेज़ों से होता है, नारों से नहीं।

प्रमुख संदर्भ
Leonard A. Gordon, Brothers Against the Raj.
B. D. Graham, Hindu Nationalism and Indian Politics.
Harun-or-Rashid, The Foreshadowing of Bangladesh: Bengal Muslim League and Muslim Politics.
R. C. Majumdar, History of the Freedom Movement in India.
Joya Chatterji, Bengal Divided: Hindu Communalism and Partition.
Government of India Act, 1935.
Bengal Legislative Assembly Debates (1937–1943).
The Transfer of Power, 1942–47 (British Government Documents).
Syama Prasad Mookerjee, Leaves from a Diary तथा अन्य पत्र-संग्रह।
A. K. Fazlul Huq के समकालीन पत्र एवं सरकारी अभिलेख।

आलेख : सुरेश चौधरी, कोलकाता 
मो : 9830010986

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