भाषा की राजनीति और राजनीति की भाषा-विवेक रंजन श्रीवास्तव


 शब्द को ब्रह्म कहा गया है ।  शब्द केवल ध्वनि नहीं रहे,  वे मनुष्य की नियति लिखने लगे। सत्ता ने तलवार से पहले शब्दों पर अधिकार करना सीखा, क्योंकि तलवार शरीर को घायल करती है, शब्द चेतना को। इसलिए जहाँ भी राजनीति जन्म लेती है, वहाँ भाषा उसके सबसे विश्वसनीय सेनापति की तरह खड़ी दिखाई देती है। और जहाँ भाषा अपनी सहजता खो देती है, वहाँ समझ लेना चाहिए कि राजनीति ने उसकी उँगली थाम कर उसका दुरुपयोग करना शुरू कर दिया  है।

भाषा किसी वृक्ष की तरह होती है। उसकी जड़ें लोक में होती हैं, तना संस्कृति में और शाखाएँ भविष्य की ओर फैलती हैं। राजनीति उस वृक्ष पर अपने झंडे बाँध देना चाहती है। 
वह चाहती है कि हर पत्ता उसकी विचारधारा की दिशा में हिले, हर फूल उसकी विजय का रंग धारण करे। किंतु भाषा का स्वभाव हवा जैसा होता है । उसे बाँधा नहीं जा सकता। वह नदी की भांति ,अंततः उसी दिशा में बहती है जहाँ मनुष्य की साँस बची रहती है, जहां प्रवाह के लिए वांछित वैचारिक तथा भाषाई विस्तार की लोक व्यवहार की, उपयोगिता और संप्रेषण की संभावना की गहराई होती है।

राजनीति का पहला कौशल शब्दों के अर्थ बदलना है। वह पराजय को रणनीति, समझौते को दूरदर्शिता, विरोध को षड्यंत्र और प्रचार को जनमत कहने से भी नहीं हिचकती है। धीरे-धीरे शब्द अपने पुराने वस्त्र उतार देते हैं और नए अर्थों का परिधान पहन लेते हैं। शब्दकोश मौन रहता है, पर समाज का मानस बदल जाता है। यही राजनीति की सबसे सूक्ष्म विजय होती है ।जब भाषा सच नहीं बोलती, बल्कि सच का अभिनय करने लगती है।

चुनाव का मौसम वस्तुतः भाषा का सबसे बड़ा उत्सव नहीं, उसकी सबसे कठिन परीक्षा होता है। भाषा और क्षेत्रीयता की भावनाओं को हथियार बनाना राजनीति जानती है। विपक्ष के प्रति भद्दे  शब्द, फूलों की वर्षा की तरह बरसाये जाते हैं।  किंतु उनके भीतर जब तक काँटों का अनुशासन छिपा रहता है,वे लोक मर्यादित भाषा में रहे आते हैं। वादे कविता की तरह सुनाई देते हैं, आरोप व्यंग्य की तरह और घोषणाएँ भविष्यवाणी की तरह। जनता हर बार शब्दों की चमक में अपना कल खोजती है, जबकि राजनीति जानती है कि मतदाता की  स्मृति  क्षणिक  होती हैं। इसलिए वह हर चुनाव में नई भाषा गढ़ती है, जैसे गिरगिट कामाफ्लाज कर अवसर के अनुरूप नया रंग धारण करता रहता है।

भाषा की अपनी भी राजनीति है। कोई भाषा राजभवनों तक पहुँच जाती है, कोई लोकगीतों में ही जीवन काट देती है। कोई बोली विद्यालय के द्वार पर ही ठिठक जाती है, तो कोई संसद के गलियारों में अधिकारपूर्वक चलती है। यह केवल व्याकरण का अंतर नहीं, सत्ता के लिए वोटो के वितरण का मानचित्र बनाया जाता है। भाषा का सम्मान दरअसल मनुष्य के सम्मान का दूसरा नाम है। जिस दिन किसी बोली को तुच्छ कहा जाता है, उसी दिन उसके बोलने वाले मनुष्यों की गरिमा भी घायल हो जाती है।

आज यह खेल और भी महीन हो गया है। पहले शब्द भाषणों से निकलते थे, अब वे स्क्रीन से फिसलते हैं। हैशटैग नए नारे हैं, मीम नए व्यंग्य और ट्रोल नई भीड़। सच और झूठ के बीच की दूरी अब शब्दों की नहीं, उनकी गति की हो गई है। जो पहले लोगों के दिलों दिमाग तक पहुँच जाता है, वही अक्सर सत्य मान लिया जाता है। इसलिए राजनीति होड़ करती है।भाषा अब बाज़ार भी है, युद्धभूमि भी और प्रयोगशाला भी, जहाँ हर दिन अर्थों के नए रसायन तैयार किए जा रहे हैं।

फिर भी राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह भाषा का उपयोग तो कर सकती है, स्वामित्व नहीं पा सकती। समय सबसे कठोर संपादक है। वह भाषणों की चकाचौंध से चमकीले वाक्य मिटा देता है और केवल वही शब्द बचाकर रखता है जिनमें मनुष्य की करुणा, न्याय और सत्य की धड़कन होती है। इसी कारण इतिहास में असंख्य नारे धूल हो गए, पर कबीर की उलटबाँसियाँ, तुलसी की चौपाइयाँ, प्रेमचंद की भाषा और दिनकर का ओज आज भी जीवित हैं। साहित्य का शब्द संसार सत्ता के लिए नहीं, समय के लिए रचा जाता है।

वास्तव में भाषा और राजनीति का संबंध दर्पण और चेहरे जैसा है। राजनीति जितनी बार अपना चेहरा बदलती है, भाषा उतनी ही बार नया प्रतिबिंब रचती है। किंतु दर्पण की एक ईमानदारी होती है, वह अंततः चेहरा वैसा ही दिखा देता है जैसा वह है। इसलिए किसी राष्ट्र की असली शक्ति उसकी सेनाओं या संसदों से अधिक , उसकी भाषा की नैतिकता में निहित होती है। जिस दिन शब्द भय से मुक्त होकर सत्य का उच्चारण करने लगते हैं, उसी दिन लोकतंत्र का वास्तविक सूर्योदय होता है। और जिस दिन भाषा केवल सत्ता की प्रतिध्वनि बनकर रह जाती है, उसी दिन सभ्यता का सांध्यकाल आरंभ हो जाता है। इसलिए साहित्यकार की समाज के प्रति जवाबदारी बहुत ज्यादा होती है।भाषा को राजनीति के गंदे खेल से बचाना केवल व्याकरण को बचाना नहीं, मनुष्य की स्वतंत्र आत्मा को बचाना है।

 -विवेक रंजन श्रीवास्तव

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