आप का इस बेवसाइट पर स्वागत है। साहित्य सरोज पेज को फालो करें( https://www.facebook.com/sarojsahitya.page/
चैनल को सस्क्राइब कर हमारा सहयोग करें https://www.youtube.com/channe /UCE60c5a0FTPbIY1SseRpnsA
सुबह के करीब 5 बजे होंगे। सुनील की नींद
किसी आवाज़ से टूट गई। उसने खिड़की से देखा , एक बहुत छोटा सा गाय का बच्चा रंभा रहा था। उसकी आवाज़ में बहुत दर्द था। सुनील ने पत्नी कल्पना को पुकारा-
सुनील- " कल्पना देखो ना छोटा सा बच्चा कितने करुण स्वर में अपनी माँ को पुकार रहा है।"
कल्पना- " हाँ लगता है भटक कर इधर आ गया।"
दोनो ने आस पास देखा कोई नहीं था।
देखा बछड़ा है।
मुहल्ले के लोग इकट्ठे हो गये किसी को भी कुछ पता नहीं था।
बछड़े की करुणा भरी पुकार से सब द्रवित थे।
उन्होने पास की गौ शाला का मालिक को बुलाया, पूछने पर कहा -
मालिक - " ये बछड़ा मेरी ही गौ शाला की गाय का है। मैने सोचा बछिया होती तो बड़ी हो कर दूध देती। इसको खिला पिला ,खर्चा कर के बड़ा करुं ।अगर तगड़ा बैल नहीं बना तो मेरा खर्च भी नहीं निकलेगा। इसी लिये मैं यहाँ इसे छोड़ ग्स्या था।"
सब उसे गुस्से से घूर रहे थे, कैसी विडंबना है,कईयों को लड़की नहीं चाहिये और ग्वालों को गाय का बछड़ा नहीं चाहिये
नीरजा ठाकुर
पलावा डोंबीवली
29-6-2020
0 टिप्पणियाँ