बस अब और नहीं-अश्विन पाण्डेय 

ऊँची  घायल  बिल्डिंगे  चीख  कर कहती  है "बस अब और नहीं"
पत्थर की दीवारों  के पिछेसे  उठा धुवां  बोलता  है "बस अब और नहीं"


मासूम शहीदों  की लाशें , मछवारों  के शव कहते  है "बस अब और नहीं"
अब तो मुर्दा  लाशें भी चीख पड़ी  बिल्डिंग  ली  दीवारे  भी बोल  पड़ी 
हम सब कब  बोलेंगे  "बस अब और नहीं"


"बस अब और नहीं" कब तक पूछेंगे  हम ये सवाल  
"बस अब और नहीं"क्या है इसका  कोई  जवाब  


अगर जवाब है तो देगा कौन 
नेता सिपाही या हमारा  ये मन  


कोण लेगा  जिम्मेदारी  इस मनहूस  इतिहास  को बदलनेकी  
या हमें  अदात्सी  हो गयी  है गिर  कर सम्भलनेकी  


गिरकर संभालना  क्यू आसानीसे  आ जाता  है 
क्याबार बार गिरना  सबको मजा दिलाता  है 


क्यू बार बार हम आतंकी  हमले   पर गहरी  नींद सो  जाते   है 
क्यू अंधकार  भरे सपने  हमको  नहीं डराते  है 
क्यू नहीं खून खौलता  जब नेता हसकर  भाषन  देता  है 
क्यू उनके  उनके सब जुर्म  माफ़  कर देते  है 


क्यू हम खुश  है इस जेहरीले  मोहोल  में 
ये किस बात की समझदारी  है 
अगली बार किसी अपने के मरने की क्या कर रखी  तैयारी है


आँखें  जब भीगेगी  किसी अपने की खून से
शायद तब उभरेंगे  मिलकर हम एक  जुनून  से 
कब तक बैठेंगे  हम  हाथो  में हाथ  डाल  कर 
क्यू नहीं ले  सकते सरफ़रोशी  की मशाल  अपने हाथ में


आओ हाथ मिलाये  और जनम  दे अपने अंदर  के सिपाही को 
लढेंगे ऐसे के आतंक  की पूरी   तबाही  हो 
नहीं आएगा कोई भगत  सींग लड़ने  अपनी लड़ाई  को 
होने दो हाथ मैले आओ अंजाम  दे इस सफाई  को


सफाई करे  ऐसे के एक छोटा  दाग भी बचे नहीं 
तब हाथ झटक  कर हम बोले  "बस अब और नहीं"

अश्विन- पाण्डेय
+91 98200 50614


 


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