ये तो- निशा

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ये तो-
शाश्वत सत्य है 
कि मृत्यु तो आयेगी, 
पर ये नहीं था ज्ञात 
बिन दस्तक 
दबे पैरों 
यूँ चुपके से आयेगी।


बिना किसी से कुछ कहे
बिना किसी से गले मिले
बिना किसी के आँसुओं को देखे
हमें अनाथ सा ले जायेगी।


न कोई क्रियाकर्म करने वाला
न को कोई सांत्वना देने वाला 
ये अपने आप से                      
कैसी लड़ाई है ?


कोई नहीं जीने मरने का 
हिसाब रखने वाला
कर दिया महामारी ने 
अकेला अनंत सबको, 
वर्षों तक निभायें रिश्ते 
पल भर में झूठे होकर
तक बैठ गए 
और हम तुम सिर्फ 
हाथ मलते रह गए। 


निशा नंदिनी भारतीय 
तिनसुकिया, असम


 



 


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