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अपनें आँचल में खिलतें-बुझते,
इतिहासों को तोल रहा हूँ।
मैं हिमालय बोल रहा हूँ।
ना जानें किस युग से ,
मैं अखण्ड खड़ा हूँ,
इस भारत भू पर ,
ना जानें किस क्षण से हूँ,
इस प्रचंड भू पर ।
ना जानें कब तक खड़ा रहूँगा,
आखिर कब तक अपनी जिद पर अड़ा रहूँगा।
दुश्मन की कायरता सें,
मेरा मन खौल रहा है,
यह मैं नही,
मेरे लहू का उबाल बोल रहा है।
मैं अपनें आँचल में खिलते-बुझते,
इतिहासों को तोल रहा हूँ।
मैं हिमालय बोल रहा हूँ ।
आंचल में खिलता हैं मेरे,
रंग -बिरंग मेला।
यही वो भू-धरा है,
जिस पर राम,कृष्ण ने खेला।
इस धरती पर हुए कई हैं ,
धीर,वीर,गंभीर।
पर भारत की माटी से ,
निकलें है सबसे अद्भुत वीर।
मैं इतिहासों को तोल रहा हूँ,
मैं हिमालय बोल रहा हूँ।
छत्रपति, महाराणा ने भी ,
इस माटी की आन बचाई ।
भगत सिंह ,सुखदेव, राजगुरु,
ने भी इसकी शान बढाई।
जब भी भारत कैद हुआ है,
दुश्मन की जंजीरों से,
वीरों ने छलनी की दुश्मन की छाती,
अपनें पैने तीरों से।
मैं इतिहासों को तोल रहा हूँ,
मैं हिमालय बोल रहा हूँ।
जब भी आवश्यक होगा,
मैं स्वयं रूप धरता हूँ।
इस भुमि की रक्षा को ,
काल रूप धरता हूँ।
मैं स्वयं रुद्र,मैं स्वयं काल,
बना फिरता हूँ।
दुश्मन हो रक्तबीज तो,
महाकाल बनता हूँ।
भारत की खोयी शाक्ति को,
मैं पुनः जागृत करता हूँ।
फिर , रक्तबीज के रक्त से ,
अपना भीषण खप्पर भरता हूँ।
मैं खुद में समायें इतिहासों को तोल रहा हूँ,
मैं हिमालय बोल रहा हूँ।
खण्ड-खण्ड की इस अखण्ड भू -धरा पर ,
जब तक अस्तित्व है मेरा।
हें भारत के कर्मवीर,
अमर रहेगा अस्तित्व तेरा।
मैं इतिहासों को तोल रहा हूँ,
मैं हिमालय बोल रहा हूँ ।
मैं हिमालय बोल रहा हूँ ।
अटल पैन्यूली।
देहरादून (उत्तराखंड )
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