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मोहे अपनी सुध-बुध कछु नाही।
बिखरे है केश मन परबस माही।
कब दिन बीता कछु खबर ना मोहे।
कब भोर भई मैं ना जानू कन्हाई!
मोहे अपनी सुध-बुध कछु नाही...
बदरा आए कब बरस गये।
तोहे देखे मोको कई बरस गये।
बहती नदिया बहती अखियाँ।
पर नेह दरस को तरस गये।
मोहे अपनी सुध-बुध कछु नाही...
तोरे दरस की चाह मन बसत रही।
सखियाँ सब ताना कसत रही।
करती परिहास गिरी पायलिया।
मुख ढाँप-ढाँप सब हँसत रही।
मोहे अपनी रुध-सुध कछु नाही...
सुधा भारद्वाज"निराकृति"
विकासनगर उत्तराखण्ड
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